जीने की चाहत, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

जीने की चाहत

जीने की चाहत कितना सुखद होता वह अहसास, जब हम होते पास-पास,मृदु स्वर में तुम लोरियाँ गातीं, थपकियों से मुझे सुलातीं।मेरे सुकोमल कर-स्पर्श से, तुम पल भर सुख पातीं,मेरी तनिक पीड़ा से माँ, तुम व्याकुल हो रो जातीं। माँ! उस दिन तुम अति हर्षित थी, तात की भी हँसी फूट रही थी,मैंने सोचा खुशियों का […]

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