तुलसी के चौरे का बुझता दीप
तुलसी के चौरे का बुझता दीप आँगन के उस मध्य-बिंदु पर, सिसक रही शुचिता है,जहाँ खड़ी वह हरित-मंजरी, पावनता की अक्षिता है।ईंटों का वह जीर्ण कलेवर, अब भी मौन पुकारता,पर आधुनिकता का अंधियारा, स्मृतियों को है बुहारता। संध्या की उस स्वर्ण-वेला में, जो लौ कभी प्रज्वलित थी,जिसकी ओट में सकल सृष्टि, शुभाशीष से संचालित थी।मृण्मय […]
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