विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड

विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड कहाँ लुप्त वह तेजपुंज? वह आर्य-रक्त अब श्वेत हुआ?क्या पौरुष का वह प्रचंड रवि, तिमिर-गर्त में सुप्त हुआ?मृदुल कली का अंग-अंग जब, दानव-नख से विदीर्ण था,तब न्याय-खड्ग क्या शासक के, स्वर्ण-कोष में जीर्ण था? विधि-विधान की आँखों पर तो, पट्टी जानबूझकर बंधी है,पर न्याय माँगती यह जनता, स्वयं क्यों होकर […]

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