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मृत समाज, a poetry by Rohit Choudhary, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

मृत समाज

मृत समाज रूह ने झुलस्कर आग से तो पूछा होगा उस दिन,जलकर वो जो खाक हुई क्या रूह जली होगी उस दिन?क्यूं किसी ने कहा नहीं उसे की वोतब भी जीवित रह सकती है जबये समाज न चाहें।जलना ही उसने क्यूँ ठाना जब और भी थे उपाय ।निर्मम प्रताड़ना को सहनाक्या अपनो के मुख फेर […]

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तिरंगा मेरी जान, a poetry by Pranay Misra, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

तिरंगा मेरी जान

तिरंगा मेरी जान तिरंगा मेरी जान, तिरंगा मेरी जान,इस देश पे हम कुरबान है … तिरंगा मेरी जान।एक समय था हम थे नए-नए,अब बड़े बड़े सब गाए गए,अब ज़िम्मेदारी अपनी है,उम्मीदें पूरी करनी है,शीश नवाकर कर तुझ पर अर्पित करते हैं सम्मान।तिरंगा में ही जान,तिरंगा मेरी जान,इस देश पे हम कुरबान है तिरंगा मेरी जान,उत्तर

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माँ मेरी ढाल, मेरा विश्वास, a poetry by Sakshi Singh, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

माँ: मेरी ढाल मेरा विश्वास

माँ: मेरी ढाल मेरा विश्वास जब वो सोचती है,तब उनकी चाँद से भी प्यारी आँखें और बड़ी हो जाती हैं।वो गुस्सा करती है,पर फिर खुद को सौ दफ़ा कोसती है।मैंने खाया या नहीं, हज़ार बार पूछती है।वो मेरी माँ है,जो मेरे बिना कुछ बोले भी सब समझती है।मेरा गुस्सा, मेरी चुप्पी, मेरी बग़ावत सब सहती

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एक संभव प्रयास करो, a poetry by Anamika Pandey, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

एक संभव प्रयास करो

एक संभव प्रयास करो जब लगे समाज तो अब भ्रष्ट हो रहा,मानवता का प्रतिदिन संहार हो रहा,जब लगे अब कुछ शेष है नहींऐसे देश-समाज के हित में करना,तब स्मरण हो कि यही परीक्षा की घड़ी है।मुखौटे हटेगें, देश प्रेमी-द्रोही का भेद समझ आएगा,कौन केवल जयकारा भीड़ में लगाता है,कौन बिगड़े समाज को मार्गदर्शन करा, कर,युगों

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क्यों, a poetry by Manya Somani, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

क्यों?

क्यों? “बेटा वहाँ मत जाओ”,“बेटा रात में बाहर मत जाओ”,“बेटा वो मत पहनो” सुनती हैहर लड़की बड़ी हो या छोटी।क्यों हमेशा सहे हम,क्यों हमेशा दबे हम?इस प्रांत में जहाँ मानतेनारी को लक्ष्मी का रूप,जहाँ देते उसे मान देवी का,क्यों छीन लेते सम्मान उसी का?एक किस्से से हुआ खुलासालाखों ऐसे किस्सों कादो साल की बच्ची हो

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प्रकृति के संग, Megha Pandey, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

प्रकृति के संग

प्रकृति के संग खेलें कूदे खूब हम, बिखेरें जिंदगी के रंग ।।खूब मस्तियां हम करेंगे, झूम कर प्रकृति के संग ।।ये सुंदर नदियां हैं, जो बहती संसार के संग।जीवन प्राप्ति भी इनसे, खुशियां भी प्रकृति के संग।ये वन बहुदा ही घिरे, सबका अपना अपना है ढंगनील गगन की इस छाया में, सर्प भी करते हैं

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ये कैसा तुम्हारा प्यार है, वो अब मेरी समझ के बाहर है, a poetry by Riya Narain, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

ये कैसा तुम्हारा प्यार है, वो अब मेरी समझ के बाहर है..!!

ये कैसा तुम्हारा प्यार है, वो अब मेरी समझ के बाहर है..!! तुमने तीन दिन में किया प्यार का इज़हार,कहा कि हमारे साथ में ही करार है…!!कहा ये तुम्हारे साथ ज़िंदगी बिताने को तैयार है…!!ये कैसा तुम्हारा प्यार है,जो अब मेरी समझ के बाहर है…!!! मैंने किया तुम्हें डर से इनकार,क्योंकि तुम्हें आता ज़्यादा ग़ुस्सा

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भ्रम, a poetry by Dhrupam Das, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

भ्रम

भ्रम “कहते हैं नारी का सम्मान यहाँ,पर देवी-सी डॉक्टर भी हैं परेशान यहाँ।सुरक्षा के वादे तो रोज़ सुने,पर डर से घर से निकलें गिने-चुने !बाज़ार गए थे कुछ सामान लाने,दाम सुनकर लौटे खाली थैले थामे ।महंगाई ने ऐसा खेल रचाया,सब्ज़ी भी अब तो EMI पर आया!सरकार कहे “हम विकास करेंगे”,पर टैक्स के पैसे कहाँ सहेजेंगे?गाँव

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