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एक संभव प्रयास करो, a poetry by Anamika Pandey, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

एक संभव प्रयास करो

एक संभव प्रयास करो जब लगे समाज तो अब भ्रष्ट हो रहा,मानवता का प्रतिदिन संहार हो रहा,जब लगे अब कुछ शेष है नहींऐसे देश-समाज के हित में करना,तब स्मरण हो कि यही परीक्षा की घड़ी है।मुखौटे हटेगें, देश प्रेमी-द्रोही का भेद समझ आएगा,कौन केवल जयकारा भीड़ में लगाता है,कौन बिगड़े समाज को मार्गदर्शन करा, कर,युगों […]

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क्यों, a poetry by Manya Somani, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

क्यों?

क्यों? “बेटा वहाँ मत जाओ”,“बेटा रात में बाहर मत जाओ”,“बेटा वो मत पहनो” सुनती हैहर लड़की बड़ी हो या छोटी।क्यों हमेशा सहे हम,क्यों हमेशा दबे हम?इस प्रांत में जहाँ मानतेनारी को लक्ष्मी का रूप,जहाँ देते उसे मान देवी का,क्यों छीन लेते सम्मान उसी का?एक किस्से से हुआ खुलासालाखों ऐसे किस्सों कादो साल की बच्ची हो

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प्रकृति के संग, Megha Pandey, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

प्रकृति के संग

प्रकृति के संग खेलें कूदे खूब हम, बिखेरें जिंदगी के रंग ।।खूब मस्तियां हम करेंगे, झूम कर प्रकृति के संग ।।ये सुंदर नदियां हैं, जो बहती संसार के संग।जीवन प्राप्ति भी इनसे, खुशियां भी प्रकृति के संग।ये वन बहुदा ही घिरे, सबका अपना अपना है ढंगनील गगन की इस छाया में, सर्प भी करते हैं

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ये कैसा तुम्हारा प्यार है, वो अब मेरी समझ के बाहर है, a poetry by Riya Narain, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

ये कैसा तुम्हारा प्यार है, वो अब मेरी समझ के बाहर है..!!

ये कैसा तुम्हारा प्यार है, वो अब मेरी समझ के बाहर है..!! तुमने तीन दिन में किया प्यार का इज़हार,कहा कि हमारे साथ में ही करार है…!!कहा ये तुम्हारे साथ ज़िंदगी बिताने को तैयार है…!!ये कैसा तुम्हारा प्यार है,जो अब मेरी समझ के बाहर है…!!! मैंने किया तुम्हें डर से इनकार,क्योंकि तुम्हें आता ज़्यादा ग़ुस्सा

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भ्रम, a poetry by Dhrupam Das, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

भ्रम

भ्रम “कहते हैं नारी का सम्मान यहाँ,पर देवी-सी डॉक्टर भी हैं परेशान यहाँ।सुरक्षा के वादे तो रोज़ सुने,पर डर से घर से निकलें गिने-चुने !बाज़ार गए थे कुछ सामान लाने,दाम सुनकर लौटे खाली थैले थामे ।महंगाई ने ऐसा खेल रचाया,सब्ज़ी भी अब तो EMI पर आया!सरकार कहे “हम विकास करेंगे”,पर टैक्स के पैसे कहाँ सहेजेंगे?गाँव

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हाय! कैसी ये बीमारी, a poetry by श्वेता कुमारी, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

हाय! कैसी ये बीमारी

हाय! कैसी ये बीमारी ख्वाहिशों की गर्मियों में,तप रहीं साँसें तुम्हारी,हाय! कैसी ये बीमारी – २!रात दिन में खेल खेलूं,और कभी मन से भी बोलूं,भोख क्यों इतनी बढ़ा ली,जो की में हूँ तुझ पर भारीहाय! कैसी ये बीमारी – २!ख्वाहिशें मैं हूँ ववण्डर,उठती-गिरती मन के अंदर,मौन तुम दिखते तो हो पर,सोचते अपनी लाचारीहाय! कैसी ये

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वक्त, a poetry by Monika Bararia, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

वक्त

वक्त वक्त नूर को बेनूर कर देता हैहर जख्म को नासूर कर देता हैकौन चाहता है अपनों से दूर रहनापर वक्त सबको मजबूर कर देता है….वक्त का दरिया बह जाता हैपानी की तरह यादें रह जाती हैसुनहरे लम्हों की तरह बसआपके साथ यादें रहे जिंदगी की तरह…..वक्त का पता नहीं चलता अपनों के साथअपनों का

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