एक संभव प्रयास करो, a poetry by Anamika Pandey, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

एक संभव प्रयास करो

एक संभव प्रयास करो

जब लगे समाज तो अब भ्रष्ट हो रहा,
मानवता का प्रतिदिन संहार हो रहा,
जब लगे अब कुछ शेष है नहीं
ऐसे देश-समाज के हित में करना,
तब स्मरण हो कि यही परीक्षा की घड़ी है।
मुखौटे हटेगें, देश प्रेमी-द्रोही का भेद समझ आएगा,
कौन केवल जयकारा भीड़ में लगाता है,
कौन बिगड़े समाज को मार्गदर्शन करा, कर,
युगों तक अपनी जयघोष कराता है
त्योहार-सुख में तो सभी में भाईचारा-मानवता है
पर आज परिक्षण राष्ट्र के दुर्भाग्यपूर्ण समय का है
आज परिक्षण राष्ट्र निष्ठा और धर्म का है।
तनिक समय देकर खोजो, तुम कहाँ हो?
डूबते राष्ट्र की नाव पर रक्षण के लिए अडिग हो
या केवल वाचालता कर स्वयं के पाप छिपा रहे?
राष्ट्र ऋण पूर्ण करने की घड़ी आई है,
सोचो- विचारो कितने कर्तव्यनिष्ठ हो देशहित में?
यदि उत्तर न मिले तो समझो,
समाज के अराजक-ढोंगी तत्त्व हो
और यदि असमंजस में हो, एक ही राह अब शेष…
एक संभव प्रयास करो, एक संभव प्रयास करो
टूट रहा राष्ट्र, सूख रही धरा, तप रही भारत माता,
खोज रही एक चक्रधारी-सा लाखों के बीच,
जो धरा अभिसिंचित करे, अत्याचार-अमानवीयता रोके
गीता ज्ञान देकर अंधकार मनुज का निवारे,
कोई एक हो जो साम-दाम-दण्ड-भेद से
पुण्य मार्ग प्रशस्त करे,…
बलिदान न दे सको, तो कम से कम,
एक संभव प्रयास करो, एक संभव प्रयास करो ||