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विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड

विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड कहाँ लुप्त वह तेजपुंज? वह आर्य-रक्त अब श्वेत हुआ?क्या पौरुष का वह प्रचंड रवि, तिमिर-गर्त में सुप्त हुआ?मृदुल कली का अंग-अंग जब, दानव-नख से विदीर्ण था,तब न्याय-खड्ग क्या शासक के, स्वर्ण-कोष में जीर्ण था? विधि-विधान की आँखों पर तो, पट्टी जानबूझकर बंधी है,पर न्याय माँगती यह जनता, स्वयं क्यों होकर […]

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विदीर्ण कवच, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

विदीर्ण-कवच

विदीर्ण-कवच थककर जब वह बालक आता, झुलसे चरणों की ज्वाला ले,अभावों के उस मरु-पथ पर, नयनों में अश्रु-माला ले।तब ग्रीष्म की उस प्रखर लू में, एक सघन नभोछाया थी,माँ के फटे उस अंचल में ही, करुणा की पवन-काया थी। विदीर्ण-पट के उन छिद्रों से, दिवाकर जब भी झाँकता था,ममता की उन हथेलियों से, वह अपनी

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माँ के छालों वाली रोटियों का ताप, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

माँ के छालों वाली रोटियों का ताप

माँ के छालों वाली रोटियों का ताप अंगारों के उस विग्रह पर, पकता संसार था,ममता की उस मूक अग्नि का, अथाह विस्तार था।तवे की उस दहकन में, जो करों का बलिदान था,शिशु के क्षुधा-निवारण हेतु, माँ का वह अनुष्ठान था। धुएँ की उन परतों में, ओझल हुई मुस्कान थी,मृत्तिका के उस चूल्हे में, जलता हुआ

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तुलसी के चौरे का बुझता दीप, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

तुलसी के चौरे का बुझता दीप

तुलसी के चौरे का बुझता दीप आँगन के उस मध्य-बिंदु पर, सिसक रही शुचिता है,जहाँ खड़ी वह हरित-मंजरी, पावनता की अक्षिता है।ईंटों का वह जीर्ण कलेवर, अब भी मौन पुकारता,पर आधुनिकता का अंधियारा, स्मृतियों को है बुहारता। संध्या की उस स्वर्ण-वेला में, जो लौ कभी प्रज्वलित थी,जिसकी ओट में सकल सृष्टि, शुभाशीष से संचालित थी।मृण्मय

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पावन धाम, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

पावन धाम

पावन धाम एक बार की बात सुनाऊँ, जो स्मृति-पटल पर छाई है,पाठशाला के उन कक्षों की, याद हमें हो आई है।मध्यावकाश का समय था वह, गुरुवर कर में चित्र लिए,खड़े हुए थे कक्षा सम्मुख, एक अनूठा प्रश्न लिए। उनके जर्जर हाथों में था, भारत का मानचित्र फँटा,भूखंडों का वह नक्शा, था टुकड़ों-टुकड़ों में बँटा।बोले— “जो

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गिड़गिड़ाती आवाज़, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

गिड़गिड़ाती आवाज़

गिड़गिड़ाती आवाज़ सड़कों पर पलकें बिछाए, पत्रवाहक का था इंतज़ार,निशि-दिन यही सोचा करता— “परवास यह है निरा बेकार।”मन ही मन रुष्ट होता तात पर, जो अनुशासन सिखाते थे,“अर्थ की चिंता तज, विद्या में नाम करो”— समझाते थे। तात कहते— “खून-पसीना एक कर, मैं तुझको पैसा भेजूँगा,आधी रोटी की तृप्ति से, जीवन अपना जी लूँगा।”यही सोच

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बिवाइयाँ, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

बिवाइयाँ: धरती के मानचित्र

बिवाइयाँ: धरती के मानचित्र नहीं उसे अभिलाषा कोई, न मुकुटों का मोह अतुल,मेड़ों पर वह खड़ा मौन, सहता अम्बर का कोप अकल।वह ‘सीर-ध्वज’ इस मरु-युग का, आदि-काल का मित्र है,अमर पौरुष की गाथा का, वह एक जीवंत चरित्र है। कँपाती हाड़ वह शीतल लहर, जब जग निद्रा में खोता है,तप की ऊष्मा से वह संन्यासी,

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जीने की चाहत, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

जीने की चाहत

जीने की चाहत कितना सुखद होता वह अहसास, जब हम होते पास-पास,मृदु स्वर में तुम लोरियाँ गातीं, थपकियों से मुझे सुलातीं।मेरे सुकोमल कर-स्पर्श से, तुम पल भर सुख पातीं,मेरी तनिक पीड़ा से माँ, तुम व्याकुल हो रो जातीं। माँ! उस दिन तुम अति हर्षित थी, तात की भी हँसी फूट रही थी,मैंने सोचा खुशियों का

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दो बूंद आँसू, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

दो बूंद आँसू

दो बूंद आँसू पहनी आँसुओं का निष्प्रभ हार, लिपटी मौनावृत्ति अविराम,श्रम-पीड़ा से जल-जल कर, हुआ श्याम तन मुख अम्लान।तन पर सिकुड़ा मटमैला वसन, शायद उससे भी बड़ा हो कफ़न,छलकती अल्हड़ता यौवन की, अनजानी जीवन के हर रंग से। दुपहरी जेठ की पीड़ा बढ़ाती, शोणित स्वेद बन गिर जाता,ठूँठ वृक्ष भी हैं अकुलाते, बन बैरी अरुण

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स्वेद पथ का महाप्रस्थान, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

स्वेद-पथ का महाप्रस्थान (अदृश्य शिल्पी की गाथा)

स्वेद-पथ का महाप्रस्थान खड़े नगर-प्राचीर आज भी, साक्ष्य बने उन कर का,जिन हाथों ने स्वप्न बुना था, कल के स्वर्ण-शिखर का।किंतु तनिक सी आपदा पर, हँसकर नगर ने ठुकराया,अट्टालिका खड़ी करने वाले को, बस निर्वास थमाया। ईंट-ईंट को सींचा जिसने, निज शोणित के अर्पण से,छला गया वह शिल्पकार ही, वैभव के संकर्षण से।जिन सड़कों को

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