गिड़गिड़ाती आवाज़
सड़कों पर पलकें बिछाए, पत्रवाहक का था इंतज़ार,
निशि-दिन यही सोचा करता— “परवास यह है निरा बेकार।”
मन ही मन रुष्ट होता तात पर, जो अनुशासन सिखाते थे,
“अर्थ की चिंता तज, विद्या में नाम करो”— समझाते थे।
तात कहते— “खून-पसीना एक कर, मैं तुझको पैसा भेजूँगा,
आधी रोटी की तृप्ति से, जीवन अपना जी लूँगा।”
यही सोच रहा था मैं, तभी एक स्वर ने ध्यान भंग किया,
डाकिये के कर में मुद्रा देख, मन को अति उमंग दिया।
पाकर वह धन, मन मयूर सा नूतन हर्ष में नाच उठा,
क्षण भर में ही योजनाओं का, अंबार मन में जाग उठा।
आमोद-प्रमोद और वैभव की, विलासी एक चाह लिए,
मैं निकल पड़ा बस मित्रों के संग, मन में कई उमंग लिए।
तभी एक हृदय-विदारक ध्वनि, कानों में मेरे गूँज पड़ी,
गिड़गिड़ाती सी करुण पुकार— “बाबूजी! ओ बाबूजी!”
पीछे मुड़कर देखा तो, मानो साँसें मेरी रुक गईं,
एक अनछुई तीक्ष्ण चुभन, तन में लहर सा दौड़ गई।
वस्त्र-विहीन एक नर-कंकाल सा, पथ किनारे बैठा था,
हर राही से सहायता हेतु, वह आर्त्त पुकार लगाता था।
रोम-रोम से उसके दीनता, साक्षात् झलक रही थी,
आँखों से उसके विवशता की, अश्रु-धारा छलक रही थी।
अपने मलीन वस्त्रों से उसने, मनी-ऑर्डर प्रपत्र निकाला,
मेरी ओर बढ़ाकर बोला— “कृपया इसे भर दें, बाबूजी!”
“मेरा बेटा बाहर पढ़ता है, उसे पैसों की है दरकार,”
“नहीं भेजने पर उसका जीवन, हो जाएगा बेकार बाबूजी!”
उनकी उस मूक वेदना ने, अंतर्मन को झकझोर दिया,
मेरे विलासी स्वप्नों का, हर तंतु पल में तोड़ दिया।
उनकी उन मर्मभेदी बातों से, पैरों तले भूमि खिसक गई,
नयनों के सम्मुख तात की, वह अकम्पित तस्वीर लटक गई!

“मेरा नाम कन्हैया कुमार है। मैं मूलतः मधुबनी (बिहार) की सांस्कृतिक चेतना से संबद्ध हूँ और वर्तमान में अहमदाबाद में एक वरिष्ठ प्रबंधक (Senior Manager) के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहा हूँ। यांत्रिक अभियांत्रिकी (Mechanical Engineering) और प्रबंधन (MBA Finance) की व्यावसायिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, हिंदी साहित्य मेरा आत्मिक क्षेत्र है।
मेरी काव्य-शैली तत्सम प्रधान शब्दावली और गहन भाव-बोध पर आधारित है। मेरी लेखनी मानवीय संवेदनाओं के विविध आयामों—चाहे वह ओज हो, करुण हो या सौंदर्य—को शब्दबद्ध करने का प्रयास करती है।
साहित्य के प्रति इसी समर्पण हेतु मुझे ‘शब्द प्रतिभा बहुक्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन, नेपाल’ द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा रत्न मानद उपाधि-2026’ से विभूषित किया गया है। इसके अतिरिक्त, IIIT नागपुर की अखिल भारतीय प्रतियोगिता ‘रसधारा-2026’ में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। अब तक ५०० से अधिक मौलिक रचनाओं के माध्यम से मेरा ध्येय हिंदी काव्य की गरिमा को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करना है।”


