पावन धाम
एक बार की बात सुनाऊँ, जो स्मृति-पटल पर छाई है,
पाठशाला के उन कक्षों की, याद हमें हो आई है।
मध्यावकाश का समय था वह, गुरुवर कर में चित्र लिए,
खड़े हुए थे कक्षा सम्मुख, एक अनूठा प्रश्न लिए।
उनके जर्जर हाथों में था, भारत का मानचित्र फँटा,
भूखंडों का वह नक्शा, था टुकड़ों-टुकड़ों में बँटा।
बोले— “जो इस छिन्न-भिन्न, चित्र को फिर संजोएगा,
इस सभा के सम्मुख आज वही, गौरव का पदक पाएगा।”
अनवरत यत्न सब विफल हुए, कोई उसे जोड़ न पाया,
विफल हुआ हर एक प्रयत्न, जब हल कोई सूझ न पाया।
तभी एक बालक ने सहसा, अपनी युक्ति प्रबल लगाई,
उस नन्हे से प्रखर बुद्धि ने, अद्भुत एक राह दिखाई।
क्षण भर में ही उसने सारे, विखरे टुकड़े जोड़ दिए,
जटिल पहेली जो गुरुवर की, उसके बंधन तोड़ दिए।
हतप्रभ होकर गुरुवर बोले— “अचरज यह कैसे कर डाला?
भारत के इस विखरे भूगोल को, कैसे पुनः संजो डाला?”
बालक बोला— “मैंने भारत के भूखंड को नहीं जोड़ा,
उसके उल्टे पृष्ठ में छपी, मानव तस्वीर को जोड़ा”।

“मेरा नाम कन्हैया कुमार है। मैं मूलतः मधुबनी (बिहार) की सांस्कृतिक चेतना से संबद्ध हूँ और वर्तमान में अहमदाबाद में एक वरिष्ठ प्रबंधक (Senior Manager) के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहा हूँ। यांत्रिक अभियांत्रिकी (Mechanical Engineering) और प्रबंधन (MBA Finance) की व्यावसायिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, हिंदी साहित्य मेरा आत्मिक क्षेत्र है।
मेरी काव्य-शैली तत्सम प्रधान शब्दावली और गहन भाव-बोध पर आधारित है। मेरी लेखनी मानवीय संवेदनाओं के विविध आयामों—चाहे वह ओज हो, करुण हो या सौंदर्य—को शब्दबद्ध करने का प्रयास करती है।
साहित्य के प्रति इसी समर्पण हेतु मुझे ‘शब्द प्रतिभा बहुक्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन, नेपाल’ द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा रत्न मानद उपाधि-2026’ से विभूषित किया गया है। इसके अतिरिक्त, IIIT नागपुर की अखिल भारतीय प्रतियोगिता ‘रसधारा-2026’ में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। अब तक ५०० से अधिक मौलिक रचनाओं के माध्यम से मेरा ध्येय हिंदी काव्य की गरिमा को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करना है।”


