पावन धाम, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

पावन धाम

पावन धाम

एक बार की बात सुनाऊँ, जो स्मृति-पटल पर छाई है,
पाठशाला के उन कक्षों की, याद हमें हो आई है।
मध्यावकाश का समय था वह, गुरुवर कर में चित्र लिए,
खड़े हुए थे कक्षा सम्मुख, एक अनूठा प्रश्न लिए।

उनके जर्जर हाथों में था, भारत का मानचित्र फँटा,
भूखंडों का वह नक्शा, था टुकड़ों-टुकड़ों में बँटा।
बोले— “जो इस छिन्न-भिन्न, चित्र को फिर संजोएगा,
इस सभा के सम्मुख आज वही, गौरव का पदक पाएगा।”

अनवरत यत्न सब विफल हुए, कोई उसे जोड़ न पाया,
विफल हुआ हर एक प्रयत्न, जब हल कोई सूझ न पाया।
तभी एक बालक ने सहसा, अपनी युक्ति प्रबल लगाई,
उस नन्हे से प्रखर बुद्धि ने, अद्भुत एक राह दिखाई।

क्षण भर में ही उसने सारे, विखरे टुकड़े जोड़ दिए,
जटिल पहेली जो गुरुवर की, उसके बंधन तोड़ दिए।
हतप्रभ होकर गुरुवर बोले— “अचरज यह कैसे कर डाला?
भारत के इस विखरे भूगोल को, कैसे पुनः संजो डाला?”

बालक बोला— “मैंने भारत के भूखंड को नहीं जोड़ा,
उसके उल्टे पृष्ठ में छपी, मानव तस्वीर को जोड़ा”।