दो बूंद आँसू, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

दो बूंद आँसू

दो बूंद आँसू

पहनी आँसुओं का निष्प्रभ हार, लिपटी मौनावृत्ति अविराम,
श्रम-पीड़ा से जल-जल कर, हुआ श्याम तन मुख अम्लान।
तन पर सिकुड़ा मटमैला वसन, शायद उससे भी बड़ा हो कफ़न,
छलकती अल्हड़ता यौवन की, अनजानी जीवन के हर रंग से।

दुपहरी जेठ की पीड़ा बढ़ाती, शोणित स्वेद बन गिर जाता,
ठूँठ वृक्ष भी हैं अकुलाते, बन बैरी अरुण अनल बरसाता।
सामने गर्वित गगनचुम्बी आलीशान, अट्टालिकाएँ बिहँस रहीं देख मुख अम्लान,
परिंदों की टोली पूछ रही आकर, “क्या तन में अब भी बचे हैं प्राण?”

भरी दुपहरी का वह पल, तवा सा जलता यह भूतल,
बना वातावरण वह्नि-वाहक निष्प्रभ, है सूना पथ और सूना नभ।
माथे से टपकती पसीने की बूंद, वह तोड़ती पत्थर आँखें मूंद,
उदर-क्षुधा की अग्नि में जलता तन, है अविचल कर्मरथी मन।

गिरती आकर कलेजे पर, पाषाण पर लगी हर प्रहार,
टूटता नहीं वह पत्थर है, पर मानवता टूट रही हर बार।
धरा पर यह कैसा अभिशाप, निर्धनता का कैसा यह संताप,
मंद-मंद आकर गिरती है, पल-प्रतिपल बनकर तलवार।

वह तोड़ रही है शिला कठिन, निज ढहते घर की आस में,
निष्ठुर नियति के प्रस्तर को, बदल रही विश्वास में।
हर चोट में इक धुन छिपी, निज लघु नीड़ संभालने की,
पाषाणों को धूल बना, जीवन की लौ पालने की।

उद्दाम लालसा जीवन की,
दबी दीनता के तले,
स्वप्न सनी संसार सजाने की सोच,
“दो बूंद आँसू” आँखों से टपक पड़े।