दो बूंद आँसू, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

दो बूंद आँसू

दो बूंद आँसू पहनी आँसुओं का निष्प्रभ हार, लिपटी मौनावृत्ति अविराम,श्रम-पीड़ा से जल-जल कर, हुआ श्याम तन मुख अम्लान।तन पर सिकुड़ा मटमैला वसन, शायद उससे भी बड़ा हो कफ़न,छलकती अल्हड़ता यौवन की, अनजानी जीवन के हर रंग से। दुपहरी जेठ की पीड़ा बढ़ाती, शोणित स्वेद बन गिर जाता,ठूँठ वृक्ष भी हैं अकुलाते, बन बैरी अरुण […]

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