स्वेद पथ का महाप्रस्थान, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

स्वेद-पथ का महाप्रस्थान (अदृश्य शिल्पी की गाथा)

स्वेद-पथ का महाप्रस्थान

खड़े नगर-प्राचीर आज भी, साक्ष्य बने उन कर का,
जिन हाथों ने स्वप्न बुना था, कल के स्वर्ण-शिखर का।
किंतु तनिक सी आपदा पर, हँसकर नगर ने ठुकराया,
अट्टालिका खड़ी करने वाले को, बस निर्वास थमाया।

ईंट-ईंट को सींचा जिसने, निज शोणित के अर्पण से,
छला गया वह शिल्पकार ही, वैभव के संकर्षण से।
जिन सड़कों को गढ़ा स्वयं, उन पर ही न पा सके शरण,
कठिन काल के क्रूर थपेड़ों ने, कर डाला सब हरण।

पंखहीन वे विहग थके से, निकल पड़े अब नीड़ तज,
नगर-मोह की बेड़ी टूटी, जागा मन में नया सहज।
जहाँ न कोई छत्र शेष था, जहाँ न कोई मीत मिला,
वहाँ मरुस्थल की लू में, बस पटरियों का ही गीत खिला।

तपती लौह-धमनी पर देखो, सिमटी हुई है अब आशा,
उस मूक-निर्जीव धातु ने, दी जीवन को परिभाषा।
शहरों ने जब द्वार मूँद कर, ओढ़ा पाखंडी-कवच,
तब इन तप्त पटरियों ने ही, झेला पाँवों का केवल सच।

इन पटरियों के संग-संग, चल पड़े थके वे नंगे पाँव,
जहाँ दूर क्षितिज पार कहीं, रँभाता होगा अपना गाँव।
मशीनी शोर से दूर कहीं, मिट्टी की सौंधी खुशबू थी,
नगर की स्वार्थी भीड़ से बड़ी, अपनों की वो आरजू थी।

उदर में भीषण दावानल, कंधों पर बोझिल संसार,
छाले पैरों में सिसक रहे, पर हृदय न माना हार।
दूधमुँहे उस शिशु की भूख, और माँ का सूखा आँचल,
पत्थर भी अब रो पड़े देख, मज़दूर का वह सम्बल।

ठिठक गया सहसा वह पथ, नन्हे पग अब थककर सो गए,
जननी ने जगाया अनवरत, पर नयन न फिर से खोले गए।
धूप जली, लोहा तपता रहा, समय भी जैसे थम गया,
पटरियों ने उस मौन क्षण में, एक और स्वप्न निगल लिया।

जहाँ पसीना बहा मौन, वहाँ अब बहता लोहित ताप,
सभ्यता के मुख पर जड़ा, विवशता का यह करारा छाप।
सृजन के उन अदृश्य शिल्पी का, शेष रहा यह रिक्त विधान,
अमिट इतिहास साक्षी है-“स्वेद-पथ का महाप्रस्थान”।