स्वेद-पथ का महाप्रस्थान
खड़े नगर-प्राचीर आज भी, साक्ष्य बने उन कर का,
जिन हाथों ने स्वप्न बुना था, कल के स्वर्ण-शिखर का।
किंतु तनिक सी आपदा पर, हँसकर नगर ने ठुकराया,
अट्टालिका खड़ी करने वाले को, बस निर्वास थमाया।
ईंट-ईंट को सींचा जिसने, निज शोणित के अर्पण से,
छला गया वह शिल्पकार ही, वैभव के संकर्षण से।
जिन सड़कों को गढ़ा स्वयं, उन पर ही न पा सके शरण,
कठिन काल के क्रूर थपेड़ों ने, कर डाला सब हरण।
पंखहीन वे विहग थके से, निकल पड़े अब नीड़ तज,
नगर-मोह की बेड़ी टूटी, जागा मन में नया सहज।
जहाँ न कोई छत्र शेष था, जहाँ न कोई मीत मिला,
वहाँ मरुस्थल की लू में, बस पटरियों का ही गीत खिला।
तपती लौह-धमनी पर देखो, सिमटी हुई है अब आशा,
उस मूक-निर्जीव धातु ने, दी जीवन को परिभाषा।
शहरों ने जब द्वार मूँद कर, ओढ़ा पाखंडी-कवच,
तब इन तप्त पटरियों ने ही, झेला पाँवों का केवल सच।
इन पटरियों के संग-संग, चल पड़े थके वे नंगे पाँव,
जहाँ दूर क्षितिज पार कहीं, रँभाता होगा अपना गाँव।
मशीनी शोर से दूर कहीं, मिट्टी की सौंधी खुशबू थी,
नगर की स्वार्थी भीड़ से बड़ी, अपनों की वो आरजू थी।
उदर में भीषण दावानल, कंधों पर बोझिल संसार,
छाले पैरों में सिसक रहे, पर हृदय न माना हार।
दूधमुँहे उस शिशु की भूख, और माँ का सूखा आँचल,
पत्थर भी अब रो पड़े देख, मज़दूर का वह सम्बल।
ठिठक गया सहसा वह पथ, नन्हे पग अब थककर सो गए,
जननी ने जगाया अनवरत, पर नयन न फिर से खोले गए।
धूप जली, लोहा तपता रहा, समय भी जैसे थम गया,
पटरियों ने उस मौन क्षण में, एक और स्वप्न निगल लिया।
जहाँ पसीना बहा मौन, वहाँ अब बहता लोहित ताप,
सभ्यता के मुख पर जड़ा, विवशता का यह करारा छाप।
सृजन के उन अदृश्य शिल्पी का, शेष रहा यह रिक्त विधान,
अमिट इतिहास साक्षी है-“स्वेद-पथ का महाप्रस्थान”।

“मेरा नाम कन्हैया कुमार है। मैं मूलतः मधुबनी (बिहार) की सांस्कृतिक चेतना से संबद्ध हूँ और वर्तमान में अहमदाबाद में एक वरिष्ठ प्रबंधक (Senior Manager) के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहा हूँ। यांत्रिक अभियांत्रिकी (Mechanical Engineering) और प्रबंधन (MBA Finance) की व्यावसायिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, हिंदी साहित्य मेरा आत्मिक क्षेत्र है।
मेरी काव्य-शैली तत्सम प्रधान शब्दावली और गहन भाव-बोध पर आधारित है। मेरी लेखनी मानवीय संवेदनाओं के विविध आयामों—चाहे वह ओज हो, करुण हो या सौंदर्य—को शब्दबद्ध करने का प्रयास करती है।
साहित्य के प्रति इसी समर्पण हेतु मुझे ‘शब्द प्रतिभा बहुक्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन, नेपाल’ द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा रत्न मानद उपाधि-2026’ से विभूषित किया गया है। इसके अतिरिक्त, IIIT नागपुर की अखिल भारतीय प्रतियोगिता ‘रसधारा-2026’ में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। अब तक ५०० से अधिक मौलिक रचनाओं के माध्यम से मेरा ध्येय हिंदी काव्य की गरिमा को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करना है।”


