विदीर्ण कवच, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

विदीर्ण-कवच

विदीर्ण-कवच

थककर जब वह बालक आता, झुलसे चरणों की ज्वाला ले,
अभावों के उस मरु-पथ पर, नयनों में अश्रु-माला ले।
तब ग्रीष्म की उस प्रखर लू में, एक सघन नभोछाया थी,
माँ के फटे उस अंचल में ही, करुणा की पवन-काया थी।

विदीर्ण-पट के उन छिद्रों से, दिवाकर जब भी झाँकता था,
ममता की उन हथेलियों से, वह अपनी पराजय आँकता था।
वह वस्त्र नहीं, वह ‘छलनी’ थी, जिससे छनता मार्तंड-ताप था,
किन्तु अधर की उन फूँकों में, अभय-विजय का जाप था।

स्वेद के उन खारे कणों को, जो अंचल शोषित करता था,
अकिंचनता की उस पीड़ा को, अमृत से पूरित करता था।
माँ के उस कटे-फटे वस्त्र का, एक-एक कोना संजीवन था,
वही तो मेरे बाल-काल का, सबसे बड़ा अवलम्बन था।

छाले जब अपनी ही तपन से, व्याकुल होकर मूर्च्छित थे,
श्रम की उन थपकी की छाया में, हम निश्चिंत-निद्रित थे।
जगत को जो ‘दरिद्रता’ का, एक मलिन परिधान दिखा,
उसी फटे उस अंचल में ही, मुझे स्वर्ग का सोपान दिखा।

आज स्वर्ण के उन पात्रों में, वह तृप्ति कहाँ अब मिलती है?
मखमली उन शैय्याओं पर, निद्रा कहाँ अब खिलती है?
वे विदीर्ण तार ही, माँ के मन की अगाध-कोमलता थी,
उन्हीं झरोखों से छनकर आती, मेरे भाग्य की शीतलता थी।

ऐश्वर्य के इन उत्तुंग शिखरों पर, रूह अब क्रंदन करती है,
स्मृतियों के उस कुंज-द्वार पर, वह ओढ़नी आज भी विचरती है।
वह मात्र वस्त्र का टुकड़ा नहीं, मेरी नियति का विमल-पक्ष था,
धनुर्धारी उस एकलव्य का, वही तो एकमात्र लक्ष्य था।

कठिन काल की उन घड़ियों में, जो माँ के धैर्य का अर्ध्य थे,
वही विदीर्ण तार ही, मेरे भाग्य के ‘स्वर्ण-तंतु’ और ‘अटल-सच’ थे।
अग्निपथ की हर ज्वाला में, जो बाधाओं से अविजित-अविच’ थे,
माँ के पसीने से भीगे, वही मेरे ‘विदीर्ण-कवच’ थे।