विदीर्ण कवच, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

विदीर्ण-कवच

विदीर्ण-कवच थककर जब वह बालक आता, झुलसे चरणों की ज्वाला ले,अभावों के उस मरु-पथ पर, नयनों में अश्रु-माला ले।तब ग्रीष्म की उस प्रखर लू में, एक सघन नभोछाया थी,माँ के फटे उस अंचल में ही, करुणा की पवन-काया थी। विदीर्ण-पट के उन छिद्रों से, दिवाकर जब भी झाँकता था,ममता की उन हथेलियों से, वह अपनी […]

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