भ्रम
“कहते हैं नारी का सम्मान यहाँ,
पर देवी-सी डॉक्टर भी हैं परेशान यहाँ।
सुरक्षा के वादे तो रोज़ सुने,
पर डर से घर से निकलें गिने-चुने !
बाज़ार गए थे कुछ सामान लाने,
दाम सुनकर लौटे खाली थैले थामे ।
महंगाई ने ऐसा खेल रचाया,
सब्ज़ी भी अब तो EMI पर आया!
सरकार कहे “हम विकास करेंगे”,
पर टैक्स के पैसे कहाँ सहेजेंगे?
गाँव की सड़कें अब भी अधूरी,
पर नेताओं की गाड़ी नहीं हो दूर-दूरी !
भूख से मरें, दवा बिना तड़पें,
पर न्यूज़ में “देश बढ़ा” ही पढ़ें।
विकास का नारा ऐसा चला,
गरीब भूखे, अमीरों का मेला !
जिन्होंने देश के लिए जान दी,
हमने उनके सपने भुला दिए।
आज़ादी बस बातों में रह गई,
शहीदों की चाहत अधूरी ही गई।

I’m a student and a passionate writer who believes in expressing truth through poetry.


