माँ मेरी ढाल, मेरा विश्वास, a poetry by Sakshi Singh, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

माँ: मेरी ढाल मेरा विश्वास

माँ: मेरी ढाल मेरा विश्वास

जब वो सोचती है,
तब उनकी चाँद से भी प्यारी आँखें और बड़ी हो जाती हैं।
वो गुस्सा करती है,
पर फिर खुद को सौ दफ़ा कोसती है।
मैंने खाया या नहीं, हज़ार बार पूछती है।
वो मेरी माँ है,
जो मेरे बिना कुछ बोले भी सब समझती है।
मेरा गुस्सा, मेरी चुप्पी, मेरी बग़ावत सब सहती हैं,
वो मेरी माँ हैं,
जो फिर भी मेरी ढाल बनकर खड़ी रहती हैं।
वक़्त देखे, जज़्बात देखे, लोगों के उतरते नक़ाब देखे,
पर वो मेरी माँ थी जिसने समझा जब मेरे हालात बिगड़े।
वो खड़ी रही चट्टान बनकर,
वो अड़ी रही तूफ़ान बनकर,
वो मेरी माँ थी, जो साथ रही मेरे,
मेरा विश्वास बनकर।

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