लक्ष्य की जयकार कर, a poetry by Kumkum Kumari, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

लक्ष्य की जयकार कर

लक्ष्य की जयकार कर

विशाल हिमगिरि के शिखर को,
लक्ष्य जब मैंने बनाया
गर्व से उन्मादित होकर,
मुझको उसने ललकारा ।
बोला! प्रबल हूँ, प्रशस्त हूँ,
अजेय, अमर हूँ।
कण-कण से मेरा यह तन,
बना विशालकाय हूँ |
असंख्य वेदना को साध लिया,
अनेकों आमोद का त्याग किया |
तब जाकर पर्वतराज बना हूँ,
आर्यावर्त का पहरेदार बना हूँ |
गर है दम तेरी भुजाओं में,
तब रखना कदम मेरी जटाओं पर |
मैं अडिग हूँ, अचल हूँ,
कर्तव्य पथ पर खड़ा हूँ।
तू भी हो स्थिर और दिखा जग को,
कोमल मन कठोर तन को |
वही साधे लक्ष्य जो सदैव बढ़ते रहे,
भेदने की चाह में हर पल तड़पते रहे |
ललकार की जय-जयकार कर
अपने मार्ग की पहचान कर |
उठ! अब बाँध कमर,
पर्वतराज से टकराव कर |
जब तक तेरा अंतर्मन टकराएगा,
लक्ष्य को तू ही करीब पाएगा |
सब्र टूटेगा,साथ छूटेगा,
हारना मत रुकना मत |
क्या हुआ? इस बार विफल हुआ तो,
तड़प जगाए रख, हौसला बढ़ाए रख |
मैं फिर से ललकार करूँगा
लक्ष्य की जय-जयकार करूँगा |
तू अब बढ़ चल, लक्ष्य को भेद चल,
आखिर जीत तेरी होगी |

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