हे मानव! पहचान मुझे
मैं आर्त क्रंन्दन करती पृथ्वी
प्रेमरूपी अंधविश्वास से व्याप्त
जो युगों से मनुज के सभी
पाप-पुण्य वक्ष पर घरे
हे मानव! पहचान मुझे
यूँ स्वार्थी न बन जाओ
मातृ-वात्सल्य न भूल जाओ
कर्तव्य धारण करो, अन्यथा
प्रकृति न देगी क्षमादान तुझे
हे कुपुत्र! पहचान मुझे
मैं जननी, धारणा मैं ही
अन्नपूर्णा-मूल चेतना हूँ
भुला दिया स्वयं की मर्यादा
स्त्रीगमन ने न किया लज्जित तुझे
अरे नीच! पहचान मुझे
मात्र स्वार्थवश पशु हत्या की
हृदय सदा मेरा विदीर्ण हुआ
सीता वन्दित धर्म धरा है यह
न कर तू दुषित इसे
हे कुत्सित! पहचान मुझे
मुझे ढोंग-आडंबर से स्वतंत्र करा दे
वसुधैव कुटुम्बकम् अनुग्रहित
पुरुषार्थपूर्ण भारत लौटा दे
निज-स्नेह से न करुँगी निष्कासित तुझे
हे वत्स! यदि तू पहचान मुझे।

I am a student.



Bahut acha likha h miss anamika ji aapne khud likha bahut acha thought h apka and ye kavita bhi
Thnks a lot 🙏
What a beautiful poem about a soulful cry of Mother Earth, reminding us of our forgotten duties and the sacred bond we must cherish.
I’m grateful ♥ 🙏