कोरा कैनवास, a poetry by Ruchita Iyer

कोरा कैनवास

कोरा कैनवास

उस कोरे कैनवास पर आज नक्श उतारा तेरा,
तसव्वुर में जैसे हो तुम,
उसका अक्स बेहद आफरीन है,
बस उस तखय्युल को तकमील करना है l
नूर कुछ ऐसा है उस तखय्युल का,
की कोरे कैनवास पर एक माह-ए-कामिल
की तरह ज़ूरी हो तुम l
जिसे कहा ना जा सके वो फितूर हो तुम,
बेवज़ह, बस कुबूल हो तुम ,
उस कोरे कैनवास पर l
सहर में, शफक में, बस तुम हो,
तो सोचो उस कोरे कैनवास पर,
तुम्हारा शरर कितना मुक़द्दस होगा l
बस अब उस कैनवास पर मुसव्विर बनकर,
तुम्हें जो मुक्कमल किया है,
वो बेहद पाक, नायाब और
उंस से भरा एक शाहकार है ll