मन की उड़ान, a poetry by Nidhi Jain, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

मन की उड़ान

मन की उड़ान

मन की उड़ान मत पूछिए……
कभी यह गगन में उड़ता मस्त पंछी है,
कभी यह भावनाओं में बहती सुस्त ग्रंथि है ।
मन की उड़ान मत पूछिए……
इच्छाएं प्रतिपल नई नई आती इसमें,
दूर भवन तक सैर कर आती जिसमें ।
कभी कोमल तो कभी कठोर बन जाता है,
कभी मनोबल को ऊपर तो कभी नीचे ले आता है ।
मन की उड़ान मत पूछिए…..
खुशी की लहर से हो दुगना पुष्ट,
फिर अगले पल हो अपने से रुष्ट ।
क्या पहेली है यह,
मानो अंतर्दृष्टि की सहेली है यह ।
मन की उड़ान मत पूछिए…….
इसकी उड़ान परख ली जो,
तो हर पड़ाव पार हो जाएगा ।
इसकी गुत्थी सुलझ गई तो,
प्रत्येक अनुभूति, उत्साह ,अंतःकरण का वार हो पाएगा ।
मन की उड़ान मत पूछिए……