माँ: मेरी ढाल मेरा विश्वास
जब वो सोचती है,
तब उनकी चाँद से भी प्यारी आँखें और बड़ी हो जाती हैं।
वो गुस्सा करती है,
पर फिर खुद को सौ दफ़ा कोसती है।
मैंने खाया या नहीं, हज़ार बार पूछती है।
वो मेरी माँ है,
जो मेरे बिना कुछ बोले भी सब समझती है।
मेरा गुस्सा, मेरी चुप्पी, मेरी बग़ावत सब सहती हैं,
वो मेरी माँ हैं,
जो फिर भी मेरी ढाल बनकर खड़ी रहती हैं।
वक़्त देखे, जज़्बात देखे, लोगों के उतरते नक़ाब देखे,
पर वो मेरी माँ थी जिसने समझा जब मेरे हालात बिगड़े।
वो खड़ी रही चट्टान बनकर,
वो अड़ी रही तूफ़ान बनकर,
वो मेरी माँ थी, जो साथ रही मेरे,
मेरा विश्वास बनकर।

“नमस्ते, मैं साक्षी सिंह हूँ — एक भावनाओं से लिखने वाली कवयित्री। मेरे लिए कविता सिर्फ शब्द नहीं, आत्मा की आवाज़ है। ये रचना मेरी माँ के लिए है — मेरी सबसे बड़ी ताक़त, मेरी सबसे शांत पनाह। मैंने इस कविता में वही एहसास पिरोने की कोशिश की है जो शब्दों से भी गहरा होता है। आशा है आप इसे महसूस कर पाएँगे।”



Nice post!