मृत समाज
रूह ने झुलस्कर आग से तो पूछा होगा उस दिन,
जलकर वो जो खाक हुई क्या रूह जली होगी उस दिन?
क्यूं किसी ने कहा नहीं उसे की वो
तब भी जीवित रह सकती है जब
ये समाज न चाहें।
जलना ही उसने क्यूँ ठाना जब और भी थे उपाय ।
निर्मम प्रताड़ना को सहना
क्या अपनो के मुख फेर लेने से
ज्यादा दुःखद हुआ होगा?
शायद मरकर जीने से बेहतर तो मरना सुखद हुआ होगा।
क्यूँ किसी ने पौधा उखड़ जाने के बाद
उसे पुनः नहीं बोया?
क्यूं कैवल वो रोई
और दुत्कारता ये समाज नही रोया?
मैं सुनता हूँ जिन कहानियों में ‘देवी’ का सम्बोधन,
क्यूं वही कहानियां एक समाज नहीं पिरोती?
मगर मैंने देखा कुछों को रोते हुए
पहाड़ जो नदियों से रोया,
पेड़ जो झड़ कर रोया,
हवा तब ना बहकर रोई,
आग तो आग रहकर रोई,
बादल ये ना बरसा उस दिन,
पशु भी तिल-तिल तरसा उस दिन
अंतत प्रश्न यही था कि,
केवल वही मरी होगी या पूरा समाज मरा होगा उस दिन ।

Myself Rohit Choudhary, from Bikaner, Rajasthan. I did my honours degree in history from Delhi University. I write Poems, Ghazals, Shers, etc. under my pen name केवल.


