मृत समाज, a poetry by Rohit Choudhary, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

मृत समाज

मृत समाज

रूह ने झुलस्कर आग से तो पूछा होगा उस दिन,
जलकर वो जो खाक हुई क्या रूह जली होगी उस दिन?
क्यूं किसी ने कहा नहीं उसे की वो
तब भी जीवित रह सकती है जब
ये समाज न चाहें।
जलना ही उसने क्यूँ ठाना जब और भी थे उपाय ।
निर्मम प्रताड़ना को सहना
क्या अपनो के मुख फेर लेने से
ज्यादा दुःखद हुआ होगा?
शायद मरकर जीने से बेहतर तो मरना सुखद हुआ होगा।
क्यूँ किसी ने पौधा उखड़ जाने के बाद
उसे पुनः नहीं बोया?
क्यूं कैवल वो रोई
और दुत्कारता ये समाज नही रोया?
मैं सुनता हूँ जिन कहानियों में ‘देवी’ का सम्बोधन,
क्यूं वही कहानियां एक समाज नहीं पिरोती?
मगर मैंने देखा कुछों को रोते हुए
पहाड़ जो नदियों से रोया,
पेड़ जो झड़ कर रोया,
हवा तब ना बहकर रोई,
आग तो आग रहकर रोई,
बादल ये ना बरसा उस दिन,
पशु भी तिल-तिल तरसा उस दिन
अंतत प्रश्न यही था कि,
केवल वही मरी होगी या पूरा समाज मरा होगा उस दिन ।