हे मानव! पहचान मुझे, a poetry by Anamika Pandey, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

हे मानव! पहचान मुझे

हे मानव! पहचान मुझे

मैं आर्त क्रंन्दन करती पृथ्वी
प्रेमरूपी अंधविश्वास से व्याप्त
जो युगों से मनुज के सभी
पाप-पुण्य वक्ष पर घरे
हे मानव! पहचान मुझे
यूँ स्वार्थी न बन जाओ
मातृ-वात्सल्य न भूल जाओ
कर्तव्य धारण करो, अन्यथा
प्रकृति न देगी क्षमादान तुझे
हे कुपुत्र! पहचान मुझे
मैं जननी, धारणा मैं ही
अन्नपूर्णा-मूल चेतना हूँ
भुला दिया स्वयं की मर्यादा
स्त्रीगमन ने न किया लज्जित तुझे
अरे नीच! पहचान मुझे
मात्र स्वार्थवश पशु हत्या की
हृदय सदा मेरा विदीर्ण हुआ
सीता वन्दित धर्म धरा है यह
न कर तू दुषित इसे
हे कुत्सित! पहचान मुझे
मुझे ढोंग-आडंबर से स्वतंत्र करा दे
वसुधैव कुटुम्बकम् अनुग्रहित
पुरुषार्थपूर्ण भारत लौटा दे
निज-स्नेह से न करुँगी निष्कासित तुझे
हे वत्स! यदि तू पहचान मुझे।

4 thoughts on “हे मानव! पहचान मुझे”

  1. What a beautiful poem about a soulful cry of Mother Earth, reminding us of our forgotten duties and the sacred bond we must cherish.

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