वक्त
कहते है वक्त को भी वक्त लगता है
कुछ गम भुलाने के लिए
हम कितना ये वक्त के पीछे भागते है ना
ये समय ना हुआ जैसे किसी गाड़ी का पहिया हुआ
जो एक दिशा से दूसरी दिशा
दूसरी से तीसरी और बस चलते रहता है
कहते है हर ज़ख्मो पे मरहम है ये
हर दुआ की उम्मीद है ये
हर नाराज़गी की माफ़ी है ये
मगर कितना अच्छा होता जब सब कुछ वक्त पे होता
जब बिछड़े हुए रिश्ते वक्त पे मिल जाते
आशुओँ का समंदर वक्त पे बह जाता
किसी भूखे के पेट में वक्त पे दो वक्त की रोटी चले जाती
वक्त पे कोई किसी रोते हुए को मना लेता
वक्त पे किसी ने किसी के सर को सहलाते हुए कहा होता
सब ठीक हो जाएगा.
वक्त पे कोई कन्धा किसी के माथे का भार संभल लेता
वक्त पे कोई किसी के होठो की मुस्कराहट बन जाता
वक्त पे किसी की चुप्पी टूट कुछ लफ्ज़ बन जाते
वक्त पे हमें वो सब मिल जाता जो चाहिए
या फिर ये वक्त को देखने का हमारा नज़रिया गलत है
क्यूकि शायद हम वक्त के विपरीत होते है वक्त के साथ नहीं
हमारी शिकायते वक्त से इतनी है की
जो शायद ही कम हो

I am a student of psychology. I like to read books, poetry, and write. Writing poetry for me is medication for my stress or overthinking.



Your poetry touched my heart deeply, you’re a very good writer I hope you continue writing for rest of your life …. Best wishes to you !