वक्त, a poetry by Prachi Nagargade, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

वक्त

वक्त

कहते है वक्त को भी वक्त लगता है
कुछ गम भुलाने के लिए
हम कितना ये वक्त के पीछे भागते है ना
ये समय ना हुआ जैसे किसी गाड़ी का पहिया हुआ
जो एक दिशा से दूसरी दिशा
दूसरी से तीसरी और बस चलते रहता है
कहते है हर ज़ख्मो पे मरहम है ये
हर दुआ की उम्मीद है ये
हर नाराज़गी की माफ़ी है ये
मगर कितना अच्छा होता जब सब कुछ वक्त पे होता
जब बिछड़े हुए रिश्ते वक्त पे मिल जाते
आशुओँ का समंदर वक्त पे बह जाता
किसी भूखे के पेट में वक्त पे दो वक्त की रोटी चले जाती
वक्त पे कोई किसी रोते हुए को मना लेता
वक्त पे किसी ने किसी के सर को सहलाते हुए कहा होता
सब ठीक हो जाएगा.
वक्त पे कोई कन्धा किसी के माथे का भार संभल लेता
वक्त पे कोई किसी के होठो की मुस्कराहट बन जाता
वक्त पे किसी की चुप्पी टूट कुछ लफ्ज़ बन जाते
वक्त पे हमें वो सब मिल जाता जो चाहिए
या फिर ये वक्त को देखने का हमारा नज़रिया गलत है
क्यूकि शायद हम वक्त के विपरीत होते है वक्त के साथ नहीं
हमारी शिकायते वक्त से इतनी है की
जो शायद ही कम हो

1 thought on “वक्त”

  1. Your poetry touched my heart deeply, you’re a very good writer I hope you continue writing for rest of your life …. Best wishes to you !

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