आत्मविश्वास और साहस, a story by Aakanksha Thakur, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

आत्मविश्वास और साहस

आत्मविश्वास और साहस

दिनांक 7 अगस्त 2022, रविवार ।

सुबह के ठीक छह बजे थे, जब मैं अपने जीवन के पहले ट्रेक के लिए घर से निकली। दिल में उत्साह की हलचल थी, आँखों में पहाड़ की ऊँची चोटी को छू लेने का सपना और मन में कुछ नया कर गुजरने का अटूट जुनून। सबसे पहले मैं अपनी सहेली वैष्णवी के घर पहुँची। वहाँ से मैं, वैष्णवी, उसका भाई अभिषेक और हमारा मित्र तेजस, हम चारों इस रोमांच से भरी यात्रा पर निकल पड़े।
सुबह लगभग आठ बजे हमने महाराष्ट्र के पनवेल में स्थित कलावंतिन दुर्ग की चढ़ाई आरंभ की। यह मेरी पहली पहाड़ी यात्रा थी, इसलिए हर कदम पर उत्सुकता और हल्की-सी घबराहट साथ-साथ चल रही थी । मन बार-बार उस अद्भुत दृश्य की कल्पना कर रहा था, जो चोटी से दिखाई देने वाला था।
कुछ ही समय में शरीर ने अपनी सीमाएँ जतानी शुरू कर दीं। साँसें तेज़ हो गईं, कदम भारी लगने लगे। कहीं रास्ता खड़ा और कठिन था, तो कहीं घुमावदार और फिसलन भरा, तो कहीं घने जंगलों के बीच से गुजरता हुआ। लेकिन हार मानना मेरे स्वभाव में नहीं था। थोड़ी देर रुककर, खुद को संभालकर और हिम्मत जुटाकर मैंने फिर आगे बढ़ने का निर्णय लिया।
करीब दो घंटे की चढ़ाई के बाद ऐसा लगा मानो हम चोटी पर पहुँच गए हों। वहाँ से दिखता दृश्य सचमुच मन मोह लेने वाला था—नीचे फैला हुआ शहर, ऊँची-ऊँची इमारतें जैसे छोटे-छोटे खिलौनों की तरह प्रतीत हो रही थीं। पर जब यह पता चला कि यात्रा अभी आधी ही पूरी हुई है, तो मन कुछ क्षण के लिए डगमगा गया। थका हुआ शरीर और उलझा हुआ मन जैसे कह रहे थे, “अब यहीं रुक जाओ।”
परंतु आत्मा को अधूरे प्रयास से कभी संतोष नहीं मिलता। मैंने अपने भीतर की आवाज़ को सुना और आगे बढ़ने का निर्णय लिया।
आगे का रास्ता प्रकृति की अनुपम सुंदरता से भरा हुआ था – शांत झीलें, रंग-बिरंगे फूल, विशाल चट्टानें और हरियाली से सजी धरती । हम चलते रहे, कभी तस्वीरें लेते, कभी हँसते-बोलते, और जब भी कोई थक जाता, तो एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते ।
फिर वह क्षण आया, जिसने मेरे आत्मविश्वास की असली परीक्षा ली। सामने एक बेहद खड़ी, लगभग सीधी लगने वाली ढलान थी- नीचे अथाह गहराई, और बीच में बस एक पतली सी रस्सी, जिसके सहारे आगे बढ़ना था।
मैंने जैसे ही नीचे झाँका, दिल की धड़कन तेज़ हो गई। पैर मानो ज़मीन में जम गए। हवा भी उस समय कुछ अलग ही महसूस हो रही थी, जैसे हर झोंका मेरे डर को और गहरा कर रहा हो ।
मन ने धीमे से कहा,
“आकांक्षा… अब बस। यहीं तक ठीक है।”
उस पल समय जैसे ठहर गया। एक तरफ डर था, जो मुझे पीछे खींच रहा था, और दूसरी तरफ मेरा आत्मविश्वास, जो मुझे आगे बढ़ने के लिए पुकार रहा था।
तभी भीतर से एक आवाज़ गूँजी-
“क्या तुम इतनी दूर सिर्फ लौटने आई हो? क्या तुम्हारे सपने इतने कमजोर हैं कि एक डर उन्हें रोक दे? अगर आज रुक गई, तो जिंदगी भर खुद से नजरें नहीं मिला पाओगी।”
मैंने गहरी साँस ली, रस्सी को मजबूती से पकड़ा और काँपते हुए कदमों से आगे बढ़ना शुरू किया। हर कदम के साथ डर थोड़ा-थोड़ा पीछे छूटता गया और आत्मविश्वास मेरे भीतर और मजबूत होता गया। और जब मैंने वह रास्ता पार कर लिया, तो मैं सिर्फ आगे नहीं बढ़ी थी-मैं अपने डर से जीत चुकी थी। तभी मैंने सच में महसूस किया, “डर के आगे ही जीत होती है। “
आगे पहाड़ों को काटकर बनाई गई ऊँची-ऊँची सीढ़ियाँ हमारा इंतज़ार कर रही थीं। मेरे छोटे-छोटे कदमों ने भी पूरे जुनून और दृढ़ता के साथ उन्हें पार किया। और अंततः, लगभग चार घंटे की कठिन मेहनत के बाद, हम चोटी तक पहुँच ही गए।
बादलों के बीच खड़े होकर नीचे का दृश्य देखना किसी स्वप्न से कम नहीं था। इतनी कठिनाइयों के बाद मिली यह सुंदरता, सारी थकान को सुकून में बदल रही थी । वहाँ छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा स्थापित थी। मैंने श्रद्धा से शीश झुकाया और उस अविस्मरणीय क्षण को अपने हृदय में सदा के लिए संजो लिया।
उतराई का विचार फिर से मन में डर भर रहा था। पैर काँप रहे थे, और मन में आशंका थी, “क्या मैं सुरक्षित नीचे उतर पाऊँगी?”
लेकिन इस बार मैं वही आकांक्षा नहीं थी, जो शुरुआत में थी। अब मैं अपने डर को पहचान चुकी थी और उसे हराना भी सीख चुकी थी ।
मेरे मित्रों ने मेरा साथ दिया, मेरा हौसला बढ़ाया, और हम सब सुरक्षित नीचे उतर आए।
उस दिन मैंने सिर्फ एक पहाड़ की चोटी नहीं जीती थी—मैंने अपने भीतर छिपे डर को हराया था, अपने आत्मविश्वास को पहचाना था, और खुद को साबित किया था।
अब मुझे समझ आ गया है, साहस का मतलब डर का ना होना नहीं है, बल्कि डर के बावजूद आगे बढ़ना
है।
और उस दिन…. मैंने पहाड़ नहीं जीता था- -मैंने खुद को जीत लिया था ।