गुब्बारे वाला बच्चा, a poetry by Bhagat Singh, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

गुब्बारे वाला बच्चा

गुब्बारे वाला बच्चा

घूम रहा था
बीच सड़क के
पैदल पथ पर
दस-दस, के गुब्बारे बांधे
होंगे दस या बीस
बांस की लकड़ी पर लटके गुब्बारे
रंग बिरंगे तैर हवा में
छेड़ रहे थे अजब स्पंदन
एक दूजे को छेड़-छेड़ कर
मानो दो जोड़ो के कंधे
आपस में मिलकर टकराते
फिर थोड़ा हटकर मुस्काते
दी थी उसने साँसे
उन निर्जीव से दिखते
रबर के थैलों,को अपने
हिस्से की मिली साँसे भरकर
उसी साँस से जीवन पाकर
हवा तैरते और लहरते
इंद्रधनुष के रंग बिखेरे
जीवन रूपी बरखा पाकर
मन ही मन फूले गुब्बारे
बच्चों को ललचा कर अपनी ओर पुकारे,
दो गुब्बारे ले लो मुझ बच्चे से
अपने दो नन्हें बच्चों की खातिर
लौट के लेंगे , जब लौटे तो
देख के उछला खुशी दबा
पर छिपा न पाया
जाहिर होती खुशी अनोखी
जो कदमों से शुरू हुई
उनको उछला कर
हाथों की उँगली की थोड़ी
मुट्ठी बन कर
होठों में थोड़ा मुस्काकर
आँखों को करके बंद
सिरहन भरकर एक अनोखी
छोटी खुशियाँ जितनी छोटी
उनमें उतनी, बड़ी
सुकूँ की ठंडी लहरें
उर के उड़ते गरम रेत पर
टकरा कर शीतल कर जाती
मुड़कर फिर वापिस आएगी
चाँद हृदय का फिर लाएगा
लहरों से हिलते गुब्बारे
हाथ में धागा,धागे से लिपटे गुब्बारे
दो छोटे रूखे हाथों से
खुलकर जाते
दो छोटे कोमल हाथों में
बच्चे मचले दोनों
लेने वाले,देने वाले भी
पर देने वाला उससे थोड़ा
ज्यादा खुश था
पल भर की खुशी
अगले पल चिंता की रेखा
होगी माथे पर उसके
जीवन इतना कहाँ सरल है
तंगी का पल-पल पीता वो घूंट गरल है
जीवन जीना, फिर भी उसको रास है आया
जीवन में, जीवन का उसने हिस्सा पाया ॥+

2 thoughts on “गुब्बारे वाला बच्चा”

  1. Thank you so much sir for teaching me a new style of poetry a poetry that can’t tell emotion but can be felt by reader in reading
    Very lucky to compete in this competition with someone like you

    1. Thank you for the appreciating words,readers like you will encourage me for writing more.

Comments are closed.