poetry writing

बेटी

बेटी सब की पसंद नापसंद का खयाल रखती हूं,सब की सारी चीजो को संभाल रखती हूं।मेने रखे थे कहा ख्वाब मेरे में ही भूल जाती हूं,बेटी हूं मै, अकसर खुद को समझा लेती हूं।।बहेना था नदियों मैं, उड़ना था आसमानों में,मुझे मचलना था, इन आजादी की हवाओ मैं ।ये ज़मीं तो बेटों की है, उपकार […]

बेटी Read More »

मेरी आवाज़

मेरी आवाज़ अँधेरे से क्यों घबराती हो,बाहर घूमने से क्यों इतना कतराती हो,हर कोई बुरा नहीं होता,कभी किसी पर भरोसा क्यों नहीं दिखती हो?जब किसी ने उस लड़की से ये सवाल किया,तो उसकी आँखों से दर्द छलक उठा,उसने भी सवाल के बदले ही सवाल किया,आवाज़ दूँगी तो साथ दोगे क्या?बस इतना कहकर चली गई।जैसे एक

मेरी आवाज़ Read More »

पापा, a poetry by Anshul Kaushik, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

पापा

पापा जिनके साथ से मुकम्मल मेंअपनी ज़िन्दगी को मानती,एक बेहतरीन मार्गदर्शक मेंपापा आप को ही जानती…जो बेशक कुछ भी न कहेआँखों से बयाँ बस कर जाते है,जो देख लूँ चेहरा उनका मेंहर मुश्क़िल का हल हो जाए…आवाज से है जिनकी घर मेंएक अलग सा ही माहौल हैं,उनसे जुडी हर चीज़ घर मेंवास्तव में अनमोल है…पिता

पापा Read More »

माँ, a poetry by Anshul Kaushik, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

माँ

माँ चाहे कितनी ही हो फिक्र भलेवो बिलकुल नहीं दिखती है,माँ है ना…ऐसे ही अपने अर्थ को दर्शाती है…लगे बुरा किसी बात का तो,वो हमको नहीं बताती हैचाहे नम हो जाएँ आँखेंकभी वो मुँह धोकर आ जाती है…हर छोटी छोटी बातों परवो मुझे बैठ समझती है,तू भोली है ये कहकरमुझे दुनिया से अवगत करवाती है…घर

माँ Read More »

काम अधूरे रख छोड़े हैं, a poetry by Ravina, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

काम अधूरे रख छोड़े हैं।

काम अधूरे रख छोड़े हैं। काम अधूरे रख छोड़े हैंइस आस में की तुम आओगेजो छोड़ी है अधूरी दास्ताँउसे आकर पूरा कर जाओगेतुमने ही कहा था मुझसे कीहर काम की साझेदारी हैतो अपनी बात निभाने कीअब चलो तुम्हारी बारी हैसवालों की बारिश मेंमैंने उम्मीदों के कम्बल ओढ़े हैंवाजिब जवाबों की आस में मैंनेकाम अधूरे रख

काम अधूरे रख छोड़े हैं। Read More »

बचपन, a poetry by Rutuja Shinde, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

बचपन

बचपन छोटे छोटे कदम रखते चलना इन्होने सीखा,जरा जल्द ही रोटी कमाने केसवाल ने है इनको घेरालाड़-दुलार वाला यह बचपन किसी के लिएजिम्मेदारी का बोझ बन गया है,पढ़ाई लिखाई की उम्र मेंकोई बढ़ों का हाथ बटा रहा है।शिक्षा और खेलकूद वाला बचपन यहाँसभी के नसीब में कहामासूम बचपन यह इन काजग की भीड़ मे खो

बचपन Read More »

सड़क, a poetry by Garima Mishra, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

सड़क

सड़क मेरे गाँव के बीच से गुज़रतीये टूटी-फूटी, मटमैली सड़क |जानती है किस्सा और कहानी,हर अधकच्चे-अधपक्के मकान की,हर खेत और हर खलिहान की | ये सड़क जानती है,कब कल्लू की गैय्या ने बछड़ा दिया था |कब रज्जु भैय्या ने ब्याह किया था |कब बग़ल वाली चाची ने दम तोड़ा था |कब चौरसिया ने अपनी लुगाई

सड़क Read More »

भ्रम

भ्रम ‘कुछ टूटा है, कुछ चुभता है’“क्या सपना है?”अक्सरये होता रहता हैआधी कच्ची नींद में पलते,सपने कितने नाजुक होते,सच के आगे थक जाते हैं,दुनिया से घबरा जाते हैं,सपने ऐसे टूटेंगे,तुम मानने को तैयार नहीं थे,क्यों सपने बुनते हो आखिर?”जो टूटे हैं। ‘बात नहींजो तुम समझे हो।सपना कोई नहीं टूटा है,और ही कुछ टूटा हैलेकिनचुभता है’।“चुभता

भ्रम Read More »