विदीर्ण-कवच
थककर जब वह बालक आता, झुलसे चरणों की ज्वाला ले,
अभावों के उस मरु-पथ पर, नयनों में अश्रु-माला ले।
तब ग्रीष्म की उस प्रखर लू में, एक सघन नभोछाया थी,
माँ के फटे उस अंचल में ही, करुणा की पवन-काया थी।
विदीर्ण-पट के उन छिद्रों से, दिवाकर जब भी झाँकता था,
ममता की उन हथेलियों से, वह अपनी पराजय आँकता था।
वह वस्त्र नहीं, वह ‘छलनी’ थी, जिससे छनता मार्तंड-ताप था,
किन्तु अधर की उन फूँकों में, अभय-विजय का जाप था।
स्वेद के उन खारे कणों को, जो अंचल शोषित करता था,
अकिंचनता की उस पीड़ा को, अमृत से पूरित करता था।
माँ के उस कटे-फटे वस्त्र का, एक-एक कोना संजीवन था,
वही तो मेरे बाल-काल का, सबसे बड़ा अवलम्बन था।
छाले जब अपनी ही तपन से, व्याकुल होकर मूर्च्छित थे,
श्रम की उन थपकी की छाया में, हम निश्चिंत-निद्रित थे।
जगत को जो ‘दरिद्रता’ का, एक मलिन परिधान दिखा,
उसी फटे उस अंचल में ही, मुझे स्वर्ग का सोपान दिखा।
आज स्वर्ण के उन पात्रों में, वह तृप्ति कहाँ अब मिलती है?
मखमली उन शैय्याओं पर, निद्रा कहाँ अब खिलती है?
वे विदीर्ण तार ही, माँ के मन की अगाध-कोमलता थी,
उन्हीं झरोखों से छनकर आती, मेरे भाग्य की शीतलता थी।
ऐश्वर्य के इन उत्तुंग शिखरों पर, रूह अब क्रंदन करती है,
स्मृतियों के उस कुंज-द्वार पर, वह ओढ़नी आज भी विचरती है।
वह मात्र वस्त्र का टुकड़ा नहीं, मेरी नियति का विमल-पक्ष था,
धनुर्धारी उस एकलव्य का, वही तो एकमात्र लक्ष्य था।
कठिन काल की उन घड़ियों में, जो माँ के धैर्य का अर्ध्य थे,
वही विदीर्ण तार ही, मेरे भाग्य के ‘स्वर्ण-तंतु’ और ‘अटल-सच’ थे।
अग्निपथ की हर ज्वाला में, जो बाधाओं से अविजित-अविच’ थे,
माँ के पसीने से भीगे, वही मेरे ‘विदीर्ण-कवच’ थे।

“मेरा नाम कन्हैया कुमार है। मैं मूलतः मधुबनी (बिहार) की सांस्कृतिक चेतना से संबद्ध हूँ और वर्तमान में अहमदाबाद में एक वरिष्ठ प्रबंधक (Senior Manager) के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहा हूँ। यांत्रिक अभियांत्रिकी (Mechanical Engineering) और प्रबंधन (MBA Finance) की व्यावसायिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, हिंदी साहित्य मेरा आत्मिक क्षेत्र है।
मेरी काव्य-शैली तत्सम प्रधान शब्दावली और गहन भाव-बोध पर आधारित है। मेरी लेखनी मानवीय संवेदनाओं के विविध आयामों—चाहे वह ओज हो, करुण हो या सौंदर्य—को शब्दबद्ध करने का प्रयास करती है।
साहित्य के प्रति इसी समर्पण हेतु मुझे ‘शब्द प्रतिभा बहुक्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन, नेपाल’ द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा रत्न मानद उपाधि-2026’ से विभूषित किया गया है। इसके अतिरिक्त, IIIT नागपुर की अखिल भारतीय प्रतियोगिता ‘रसधारा-2026’ में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। अब तक ५०० से अधिक मौलिक रचनाओं के माध्यम से मेरा ध्येय हिंदी काव्य की गरिमा को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करना है।”


