चिड़िया, a poetry by Sweta Kumari, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

चिड़िया

चिड़िया

राहगीर अपने सफर में
एक निर से रूबरू होता।
नज़र फेरते ही खुश हो गया,
झूम उठा वो एक चिड़िया के होने से,
मानो उसे गंज-ए-ताला हासिल हो गया।
नख़ल की तरह वो बड़ी होती रही,
अब वह चिड़िया काबिल-ए-एहसास हो गई।
उसकी जिंदगी में एक अली दाखिल हुई,
जिसके लिए वह चिड़िया सांसों की तरह थी,
उसे हमेशा पास रखती।
अली जब भी मुसीबत में होती,
तो उस चिड़िया को आवाज़ लगाती ।
और चिड़िया बहारहाल
अपने सारे मशरूफ़ियत भूल
उस तक पहुँच जाती,
और अपनी इक़्तिलात निभाती।
चिड़िया की खुद की जिंदगी
अक्षर समान आसान न थी ।
उसे चाहत थी
ऊंची उड़ानों की.
आसमान पर अपना हक जताना था,
शायद उसे।
मगर अब तक सारी कोशिशें नाकाम रहीं।
नाकामी पर वह कहती कि
उसने हर लम्हे कुछ नया सीखा।
हर नाकामी की निराशा को
वह मुस्बात में बदल देती।
बात जब उसकी अली की होती,
तो अब वह हिचकिचाती,
कि कहीं उसके मसले
सुलझाते-सुलझाते
पीछे न रह जाएँ।
मगर वह तो जागरी थी न,
दिल थोड़ी मानता उसका,
और चल पड़ती
सारे मसले – मिसाऐल सुलझाने।
मगर कई बार
चिड़िया के मन में खटकता,
कि ज़रूरत के वक्त
उसके गिर्द-ओ-नवाह में
किसी को न पाती।
वह खुद को तसल्ली देती कि
ए दिलेर चिड़िया,
वो रब है न तेरे साथ,
यह फ़ानी लोगों का साथ
का क्या करेगी तू।
और फिर चिड़िया अपनी उड़ान भरने को
दोबारा तैयार हो जाती !!