जिम्मेदारी जो बचपन में आ गई, a poetry by Muskan, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

जिम्मेदारी जो बचपन में आ गई

जिम्मेदारी जो बचपन में आ गई

सोचो हालातों ने उसके साथ क्या क्या करा हुआ होगा
जो एक बच्चा अपने ही घर जाने से डरा हुआ होगा |

स्कूल में छुट्टी की घंटी, बच्चों की खिलखिलाहट थी,
लेकिन कोने में बैठे उस बच्चे के मन में डर की आहट थी|

जिसने बचपन में माँ की चीखें पिता की हुंकार को झेला होगा,
सोचो उसने कैसा ही गुड़ियों का खेल खेला होगा |

स्कूल में आओ तब लडाई, स्कूल से जाओ तब लडाई
खाते लडाई पीते लडाई,
उस बच्चे की जिंदगी तो देखो जिसे चैन की नींद दो घंटे भी नहीं मिल पायी |

ऐसा कौनसा शब्द होगा ऐसी कौनसी गाली होगी,
जो उस लडाई झगड़े ने बच्चों के कानों में नहीं डाली होगी |
हर रोज़ के झगड़े मार पिटाई से डरे हुए,
आँखों में बेबसी लाचारी लिए अंदर तक भरे हुए |
किताबे तो दिलाई पढ़ने नहीं दिया,
अच्छे स्कूल तो भेजा पर घर पर काम कभी करने नहीं दिया,
जब भी बाजार वो जाते थे, भरके फलों का थैला लाते थे,
लेकिन हालात के मारे हुए हम, वो फल कभी हलक से उतर नहीं पाते थे |

जैसी हूँ, ठीक हुँ बार बार वो कहती रही,
बच्चों की खातिर हर रोज नर्क माँ मेरी सहती रही |

वो दोर लाचारी बेबसी और ख़राबी का था,
सारा कसूर शराब का था शराबी का था |

अचानक फिर नियति ने ऐसा मोड़ लिया,
डरावने दिखने वाले उस पिता ने हमेशा के लिए हमे अकेला छोड़ दिया |

ज़ख्मों की कतार में एक और दर्द दे गयी
गली गली जगह जगह मिलने वाली शराब, हाँ वहीं शराब उन्हें ले गई |

जैसे थे मेरे पिता थे, मैं कभी नफरत उनसे कर ना सकी, विलाप तो बहुत किया, पर साथ उनके मर ना सकी|

भागदोड में पीछे कहीं छूट जाने की, एक बार और हमेशा के लिए टूट जाने की,
मन में मेरे भी बहुत है आयी
फिर भी मैं टूटी नहीं,हारी नहीं, क्योंकि बीमार रहती हैं माँ मेरी और छोटा है मेरा भाई|

मैंने फिर ये सोच लिया अपना संयम खोउगी नहीं,
कभी अपने भाई और माँ के आगे रोऊँ नहीं

पढाई केसे मजबूत करती हैं इंसान को,
मेरे एक गुरु ने मुझे बताया था |
खाली दिमाग शैतान का घर है, इसे ज्ञान से भर लो
उन्होंने मुझे सिखाया था |

फिर मैंने किताबों को अपना मान लिया,
यही उठाएंगी मुझे ऊपर मैंने ये जान लिया |
गणित पढ़ो, विज्ञान पढ़ो, चाहे इतिहास पढ़ो,
हर दिन कुछ नवीन कुछ खास पढ़ो |
जितना टूटे हो तुम पढाई तुम्हें उससे दुगना बनाएगी,
उठ जाओगे, उबर जाओगे, सारे दुखों से तुम,
तुम्हें किताबे उस चरम तक ले जाएगी |

कलम उठाई एक दिन मैंने, अपने विचारों को लिखना सीख लिया ,
कमजोर सी दिखने वाली मुस्कान ने कठोर दिखना सीख लिया |

अब भी कभी जब भावुक मैं हो जाती हूँ,
निकल लेती हूँ, लंबी दोड़ लगाने जाती हूँ,
अगर दोड़ ना सकू कभी
तो बस घूमने निकल जाती हूँ |

जो हारे हुए हैं, जो सताये हुए हैं,
जो टूटे हुए हैं, जो रुलाए हुए हैं |
उठो जागो खुद पर काम करो
पढ़ो, लिखो, खेलों, गाओ और विश्राम करो |

जिस दिन छोड़कर सब कुछ तुम खुद को बेहतर बनाओ गे
जिंदगी की हर चुनौती को मात दे जाओगे |

हाँ, ये लिखते मेरी आँखों में अब भी नमी है,
क्युकी आंसू कमजोरी नहीं,
सबूत है आपके अब तक मजबूत होने का |

5 thoughts on “जिम्मेदारी जो बचपन में आ गई”

  1. What a clear language
    Not using complicated words
    Make it more beautiful clear and understandable
    Truly a poet for comman people

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