जीने की चाहत, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

जीने की चाहत

जीने की चाहत

कितना सुखद होता वह अहसास, जब हम होते पास-पास,
मृदु स्वर में तुम लोरियाँ गातीं, थपकियों से मुझे सुलातीं।
मेरे सुकोमल कर-स्पर्श से, तुम पल भर सुख पातीं,
मेरी तनिक पीड़ा से माँ, तुम व्याकुल हो रो जातीं।

माँ! उस दिन तुम अति हर्षित थी, तात की भी हँसी फूट रही थी,
मैंने सोचा खुशियों का क्षण आया होगा, मेरे लिए ही खिलौना कोई लाया होगा।
खिलौने की वह ध्वनि, मेरे ही समीप आ रही थी,
मैं भी आह्लादित होकर, मन ही मन कुछ गा रही थी।

सहसा वह ध्वनि असह्य हुई, गर्भ के भीतर भी स्थिति दयनीय हुई,
माँ-माँ कहकर मैं चीख रही थी, हसरत भरी अक्षियों से तुमको देख रही थी।
इतने में इस नन्ही जान को, जननी तुमने ही मुझसे छीन लिया,
मौन हुई मैं तिमिर निशा सी, “जीने की चाहत” को मन में ही दफ़्न किया।

माँ! तुम तो कहती थी, घर का कुल-दीप आ रहा है,
हिम-कणों से सनी कोई शीतल बयार आ रही है।
स्वच्छ ज्योत्स्ना में धुलकर, परी एक द्वार आ रही है,
उजाड़ उपवन में लेकर कोई बहार आ रही है।

फिर तुम क्यों विवश हुई? पल में आँचल छुड़ाकर क्यों दूर हुई?
क्यों न कांपी तेरी ममता? अपनी संतति पर ही यह बर्बरता!
माँ! मैं तुम्हारी ही अंश हूँ, तुम्हारे ही हृदय का खंड हूँ,
तुम्हें नहीं सुनाऊँगी तो किसे सुनाऊँगी, जो पीड़ा मैं सह रही प्रचंड हूँ?

मैं ही तो थी अंश तुम्हारा, भविष्य का थी वंश तुम्हारा,
कोख से तुम्हारी बाहर आकर, मैं ही बढ़ाती यश तुम्हारा।
मैंने तो जग भी अभी नहीं देखी, फिर कब मैंने अपराध किया?
क्यों यह दंड मिला है मुझको, कौन सा मैंने पाप किया?

खिलौने के उस कोलाहल ने, क्यों मेरा दम घोंट दिया?
ममता के उस प्राचीर ने, क्यों नाता मुझसे तोड़ दिया?
इस लोक से व्यथित, मैं अपना दोष खोज रही थी,
क्या यही अपराध था मेरा, कि बेटी बन मैं प्रस्फुटित हुई थी?