बिवाइयाँ, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

बिवाइयाँ: धरती के मानचित्र

बिवाइयाँ: धरती के मानचित्र

नहीं उसे अभिलाषा कोई, न मुकुटों का मोह अतुल,
मेड़ों पर वह खड़ा मौन, सहता अम्बर का कोप अकल।
वह ‘सीर-ध्वज’ इस मरु-युग का, आदि-काल का मित्र है,
अमर पौरुष की गाथा का, वह एक जीवंत चरित्र है।

कँपाती हाड़ वह शीतल लहर, जब जग निद्रा में खोता है,
तप की ऊष्मा से वह संन्यासी, प्राणों को संजोता है।
जेठ की उन दुपहरियों में, जब सूर्य वह्नि उगलती है,
उस ‘पौरुष-पुंज’ के स्वेद से, जग-पिपासा शांत होती है।

यह वही भूमि है जहाँ कभी, ‘विदेह’ के संशय टूटे थे,
अकाल के उस अट्टहास में, पौरुष के स्वर फूटे थे।
हल की नोक से ‘सीत’ खिंची, और जागी आदि-भवानी थी,
आज वही ‘वसुधा-पाल’ बनकर, सहती हर मनमानी थी।

वह सीता-तत्व जो अन्न बना, हमारे विवेक की ज्वाला है,
पर ‘कृषिवल’ का ही कंठ आज, क्यों विष का प्याला है?
जो बुद्धि-शिखा को दीप्त करे, वह माटी का ही अंश यहाँ,
फिर उस ‘अन्नदाता’ के दृग में, क्यों विवशता का दंश यहाँ?

हुंकार ‘जय किसान’ की, अब केवल विवश पुकार है,
जर्जर व्यवस्था के अधरों पर, वह मिथ्या श्रृंगार है।
जब वह निज अस्थि समिधा बना, रचता अन्न-मख है,
तब जाकर इस बेदर्द शहर को, मिलता किंचित सौख्य-चख है।

श्रम का मूल्य न सिक्कों में, न शब्दों के अंबारों में,
वह ‘क्षेत्रज्ञ’ तो बिक रहा आज, अख़बारों के बाजारों में।
उसे सशक्त न दान चाहिए, उसे चाहिए निज सम्मान यहाँ,
उसका पौरुष ही असली है, बाक़ी सब व्याकुल ज्ञान यहाँ।

झुकती जहाँ सभ्यता सारी, वह उन्नत भाल प्रखर है यह,
कंचन के इन मीनारों का, असली माटी-घर है यह।
वह ‘हलधर’ इस मरु-युग का, आदि-काल का मित्र है,
बिवाइयाँ पैरों में नहीं, वे ‘धरती के मानचित्र’ हैं।