गिड़गिड़ाती आवाज़, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

गिड़गिड़ाती आवाज़

गिड़गिड़ाती आवाज़

सड़कों पर पलकें बिछाए, पत्रवाहक का था इंतज़ार,
निशि-दिन यही सोचा करता— “परवास यह है निरा बेकार।”
मन ही मन रुष्ट होता तात पर, जो अनुशासन सिखाते थे,
“अर्थ की चिंता तज, विद्या में नाम करो”— समझाते थे।

तात कहते— “खून-पसीना एक कर, मैं तुझको पैसा भेजूँगा,
आधी रोटी की तृप्ति से, जीवन अपना जी लूँगा।”
यही सोच रहा था मैं, तभी एक स्वर ने ध्यान भंग किया,
डाकिये के कर में मुद्रा देख, मन को अति उमंग दिया।

पाकर वह धन, मन मयूर सा नूतन हर्ष में नाच उठा,
क्षण भर में ही योजनाओं का, अंबार मन में जाग उठा।
आमोद-प्रमोद और वैभव की, विलासी एक चाह लिए,
मैं निकल पड़ा बस मित्रों के संग, मन में कई उमंग लिए।

तभी एक हृदय-विदारक ध्वनि, कानों में मेरे गूँज पड़ी,
गिड़गिड़ाती सी करुण पुकार— “बाबूजी! ओ बाबूजी!”
पीछे मुड़कर देखा तो, मानो साँसें मेरी रुक गईं,
एक अनछुई तीक्ष्ण चुभन, तन में लहर सा दौड़ गई।

वस्त्र-विहीन एक नर-कंकाल सा, पथ किनारे बैठा था,
हर राही से सहायता हेतु, वह आर्त्त पुकार लगाता था।
रोम-रोम से उसके दीनता, साक्षात् झलक रही थी,
आँखों से उसके विवशता की, अश्रु-धारा छलक रही थी।

अपने मलीन वस्त्रों से उसने, मनी-ऑर्डर प्रपत्र निकाला,
मेरी ओर बढ़ाकर बोला— “कृपया इसे भर दें, बाबूजी!”
“मेरा बेटा बाहर पढ़ता है, उसे पैसों की है दरकार,”
“नहीं भेजने पर उसका जीवन, हो जाएगा बेकार बाबूजी!”

उनकी उस मूक वेदना ने, अंतर्मन को झकझोर दिया,
मेरे विलासी स्वप्नों का, हर तंतु पल में तोड़ दिया।
उनकी उन मर्मभेदी बातों से, पैरों तले भूमि खिसक गई,
नयनों के सम्मुख तात की, वह अकम्पित तस्वीर लटक गई!