तुलसी के चौरे का बुझता दीप, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

तुलसी के चौरे का बुझता दीप

तुलसी के चौरे का बुझता दीप

आँगन के उस मध्य-बिंदु पर, सिसक रही शुचिता है,
जहाँ खड़ी वह हरित-मंजरी, पावनता की अक्षिता है।
ईंटों का वह जीर्ण कलेवर, अब भी मौन पुकारता,
पर आधुनिकता का अंधियारा, स्मृतियों को है बुहारता।

संध्या की उस स्वर्ण-वेला में, जो लौ कभी प्रज्वलित थी,
जिसकी ओट में सकल सृष्टि, शुभाशीष से संचालित थी।
मृण्मय उस लघु पात्र में अब, धूल का ही साम्राज्य है,
जहाँ कभी अर्पित होता था, श्रद्धा का प्रथम अर्घ्य है।

जननी के उन कोमल कर से, सींचा गया वह प्राण था,
घर की हर एक व्याधि का, वह अचूक परित्राण था।
कपूर की वह दिव्य गंध, अब व्योम में विलुप्त है,
संस्कारों की वह धरोहर, विस्मृति में अब सुप्त है।

अट्टालिकाओं के कक्षों में, विद्युत का चमत्कार है,
पर तुलसी के उस चौरे पर, एकाकी अंधकार है।
भूल गए हम उस ज्योति को, जो कुल की रक्षिका थी,
विपदाओं के हर प्रहार में, जो मौन साक्षिका थी।

सूखी हुई उन मृदु जड़ों में, इतिहास अब सिसकता है,
महानगर के कोलाहल में, विश्वास अब झिझकता है।
डिजिटल उन दीपकों में, वह ‘स्नेह’ कहाँ प्राप्य है?
तुलसी का वह रिक्त स्थान, अब तकनीक में अवाच्य है।

खण्डित उस चौरे की ईंटें, गौरव-गाथा कहती हैं,
पूर्वजों की वे सात्विक लहरें, अब भी भीतर बहती हैं।
पर हम तो उस भीड़ के राही, जो जड़ से ही विमुख हैं,
पाषाण के इस जंगल में, हम ऊपर से ही सुख हैं।

अंबर को छूने की हवस में, तज दी हमने अपनी आस्था है,
यही तो मेरे सांस्कृतिक पतन की, सबसे संकीर्ण अवस्था है।
अहम् की इस प्रलय-शिखा में, स्वयं को करता हूँ समीर्ण,
पुनः जलाता हूँ मैं— ‘तुलसी के चौरे का बुझता दीप’।