तुलसी के चौरे का बुझता दीप
आँगन के उस मध्य-बिंदु पर, सिसक रही शुचिता है,
जहाँ खड़ी वह हरित-मंजरी, पावनता की अक्षिता है।
ईंटों का वह जीर्ण कलेवर, अब भी मौन पुकारता,
पर आधुनिकता का अंधियारा, स्मृतियों को है बुहारता।
संध्या की उस स्वर्ण-वेला में, जो लौ कभी प्रज्वलित थी,
जिसकी ओट में सकल सृष्टि, शुभाशीष से संचालित थी।
मृण्मय उस लघु पात्र में अब, धूल का ही साम्राज्य है,
जहाँ कभी अर्पित होता था, श्रद्धा का प्रथम अर्घ्य है।
जननी के उन कोमल कर से, सींचा गया वह प्राण था,
घर की हर एक व्याधि का, वह अचूक परित्राण था।
कपूर की वह दिव्य गंध, अब व्योम में विलुप्त है,
संस्कारों की वह धरोहर, विस्मृति में अब सुप्त है।
अट्टालिकाओं के कक्षों में, विद्युत का चमत्कार है,
पर तुलसी के उस चौरे पर, एकाकी अंधकार है।
भूल गए हम उस ज्योति को, जो कुल की रक्षिका थी,
विपदाओं के हर प्रहार में, जो मौन साक्षिका थी।
सूखी हुई उन मृदु जड़ों में, इतिहास अब सिसकता है,
महानगर के कोलाहल में, विश्वास अब झिझकता है।
डिजिटल उन दीपकों में, वह ‘स्नेह’ कहाँ प्राप्य है?
तुलसी का वह रिक्त स्थान, अब तकनीक में अवाच्य है।
खण्डित उस चौरे की ईंटें, गौरव-गाथा कहती हैं,
पूर्वजों की वे सात्विक लहरें, अब भी भीतर बहती हैं।
पर हम तो उस भीड़ के राही, जो जड़ से ही विमुख हैं,
पाषाण के इस जंगल में, हम ऊपर से ही सुख हैं।
अंबर को छूने की हवस में, तज दी हमने अपनी आस्था है,
यही तो मेरे सांस्कृतिक पतन की, सबसे संकीर्ण अवस्था है।
अहम् की इस प्रलय-शिखा में, स्वयं को करता हूँ समीर्ण,
पुनः जलाता हूँ मैं— ‘तुलसी के चौरे का बुझता दीप’।

“मेरा नाम कन्हैया कुमार है। मैं मूलतः मधुबनी (बिहार) की सांस्कृतिक चेतना से संबद्ध हूँ और वर्तमान में अहमदाबाद में एक वरिष्ठ प्रबंधक (Senior Manager) के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहा हूँ। यांत्रिक अभियांत्रिकी (Mechanical Engineering) और प्रबंधन (MBA Finance) की व्यावसायिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, हिंदी साहित्य मेरा आत्मिक क्षेत्र है।
मेरी काव्य-शैली तत्सम प्रधान शब्दावली और गहन भाव-बोध पर आधारित है। मेरी लेखनी मानवीय संवेदनाओं के विविध आयामों—चाहे वह ओज हो, करुण हो या सौंदर्य—को शब्दबद्ध करने का प्रयास करती है।
साहित्य के प्रति इसी समर्पण हेतु मुझे ‘शब्द प्रतिभा बहुक्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन, नेपाल’ द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा रत्न मानद उपाधि-2026’ से विभूषित किया गया है। इसके अतिरिक्त, IIIT नागपुर की अखिल भारतीय प्रतियोगिता ‘रसधारा-2026’ में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। अब तक ५०० से अधिक मौलिक रचनाओं के माध्यम से मेरा ध्येय हिंदी काव्य की गरिमा को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करना है।”


