माँ के छालों वाली रोटियों का ताप, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

माँ के छालों वाली रोटियों का ताप

माँ के छालों वाली रोटियों का ताप

अंगारों के उस विग्रह पर, पकता संसार था,
ममता की उस मूक अग्नि का, अथाह विस्तार था।
तवे की उस दहकन में, जो करों का बलिदान था,
शिशु के क्षुधा-निवारण हेतु, माँ का वह अनुष्ठान था।

धुएँ की उन परतों में, ओझल हुई मुस्कान थी,
मृत्तिका के उस चूल्हे में, जलता हुआ अभिमान था।
बेलन की उस लय पर, जो भाग्य का निर्माण है,
सूखी उस एक रोटी में, भरा हुआ प्राण है।

करतलों पर उभरे वे, जो पीत-वर्ण फोले रहे,
जैसे ममता के मंदिर में, जलते हुए शोले रहे।
आज ‘माइक्रोवेव’ की उन, निर्जीव मशीनी दीवारों में,
कहाँ मिलती वह आत्मीय, संस्कारों की अनुगूँजों में?

अंगुलियों की उस संधि पर, जो अग्नि का प्रहार था,
पिता के उस कठिन श्रम का, वह मूक सहकार था।
पसीने की उन बूँदों में, घुली हुई जो शुचिता रही,
जैसे तपे हुए कंचन की, साक्षात् पुनीता रही।

थाली के उन कोनों पर, जो सजी हुई प्रीति है,
अभावों के मरुस्थल में, वह विजय की नीति है।
माँ के उन छालों में, एक सृजन का इतिहास है,
जिसकी ऊष्मा से ही खिला, हमारा विश्वास है।

न कोई वह शब्द-आडम्बर, न कोई अभिव्यक्ति थी,
केवल उन रोटियों में, रची हुई जो शक्ति थी।
त्याग की उस ज्वाला में, जो निरंतर तपता रहा,
उसी अन्न के अमृत से, आज वंश यह पलता रहा।

जिसे हम केवल क्षुधा-तृप्ति की रोटी ही समझ बैठे,
वह तो माँ के संघर्षों का, जलता हुआ जीवन था।
हर एक कौर के भीतर जो, निःशब्द अनुभव घुला था,
उसमें माँ की उन आँखों का, अधूरा सा सावन था।

वैभव के इस कोलाहल में, लुप्त हुआ स्वर्ण-क्षण है,
दौड़ रही यह भीड़ जहाँ, बस हार-जीत का रण है।
अहम् के सब पाश तज, भावों को देता हूँ आलाप,
यही मेरे उद्भव का सत्य है “माँ के छालों वाली रोटियों का ताप।”