माँ के छालों वाली रोटियों का ताप
अंगारों के उस विग्रह पर, पकता संसार था,
ममता की उस मूक अग्नि का, अथाह विस्तार था।
तवे की उस दहकन में, जो करों का बलिदान था,
शिशु के क्षुधा-निवारण हेतु, माँ का वह अनुष्ठान था।
धुएँ की उन परतों में, ओझल हुई मुस्कान थी,
मृत्तिका के उस चूल्हे में, जलता हुआ अभिमान था।
बेलन की उस लय पर, जो भाग्य का निर्माण है,
सूखी उस एक रोटी में, भरा हुआ प्राण है।
करतलों पर उभरे वे, जो पीत-वर्ण फोले रहे,
जैसे ममता के मंदिर में, जलते हुए शोले रहे।
आज ‘माइक्रोवेव’ की उन, निर्जीव मशीनी दीवारों में,
कहाँ मिलती वह आत्मीय, संस्कारों की अनुगूँजों में?
अंगुलियों की उस संधि पर, जो अग्नि का प्रहार था,
पिता के उस कठिन श्रम का, वह मूक सहकार था।
पसीने की उन बूँदों में, घुली हुई जो शुचिता रही,
जैसे तपे हुए कंचन की, साक्षात् पुनीता रही।
थाली के उन कोनों पर, जो सजी हुई प्रीति है,
अभावों के मरुस्थल में, वह विजय की नीति है।
माँ के उन छालों में, एक सृजन का इतिहास है,
जिसकी ऊष्मा से ही खिला, हमारा विश्वास है।
न कोई वह शब्द-आडम्बर, न कोई अभिव्यक्ति थी,
केवल उन रोटियों में, रची हुई जो शक्ति थी।
त्याग की उस ज्वाला में, जो निरंतर तपता रहा,
उसी अन्न के अमृत से, आज वंश यह पलता रहा।
जिसे हम केवल क्षुधा-तृप्ति की रोटी ही समझ बैठे,
वह तो माँ के संघर्षों का, जलता हुआ जीवन था।
हर एक कौर के भीतर जो, निःशब्द अनुभव घुला था,
उसमें माँ की उन आँखों का, अधूरा सा सावन था।
वैभव के इस कोलाहल में, लुप्त हुआ स्वर्ण-क्षण है,
दौड़ रही यह भीड़ जहाँ, बस हार-जीत का रण है।
अहम् के सब पाश तज, भावों को देता हूँ आलाप,
यही मेरे उद्भव का सत्य है “माँ के छालों वाली रोटियों का ताप।”

“मेरा नाम कन्हैया कुमार है। मैं मूलतः मधुबनी (बिहार) की सांस्कृतिक चेतना से संबद्ध हूँ और वर्तमान में अहमदाबाद में एक वरिष्ठ प्रबंधक (Senior Manager) के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहा हूँ। यांत्रिक अभियांत्रिकी (Mechanical Engineering) और प्रबंधन (MBA Finance) की व्यावसायिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, हिंदी साहित्य मेरा आत्मिक क्षेत्र है।
मेरी काव्य-शैली तत्सम प्रधान शब्दावली और गहन भाव-बोध पर आधारित है। मेरी लेखनी मानवीय संवेदनाओं के विविध आयामों—चाहे वह ओज हो, करुण हो या सौंदर्य—को शब्दबद्ध करने का प्रयास करती है।
साहित्य के प्रति इसी समर्पण हेतु मुझे ‘शब्द प्रतिभा बहुक्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन, नेपाल’ द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा रत्न मानद उपाधि-2026’ से विभूषित किया गया है। इसके अतिरिक्त, IIIT नागपुर की अखिल भारतीय प्रतियोगिता ‘रसधारा-2026’ में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। अब तक ५०० से अधिक मौलिक रचनाओं के माध्यम से मेरा ध्येय हिंदी काव्य की गरिमा को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करना है।”


