विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड, a poetry by Kanhaiya Kumar, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड

विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड

कहाँ लुप्त वह तेजपुंज? वह आर्य-रक्त अब श्वेत हुआ?
क्या पौरुष का वह प्रचंड रवि, तिमिर-गर्त में सुप्त हुआ?
मृदुल कली का अंग-अंग जब, दानव-नख से विदीर्ण था,
तब न्याय-खड्ग क्या शासक के, स्वर्ण-कोष में जीर्ण था?

विधि-विधान की आँखों पर तो, पट्टी जानबूझकर बंधी है,
पर न्याय माँगती यह जनता, स्वयं क्यों होकर अंधी है?
वह पत्थर की प्रतिमा तो केवल, प्रतीक भर एक अंधी है,
पर यहाँ खड़ी जो भीड़ देख रही, क्या वह भी सन्न-मंदी है?

वह भी तो था पुत्र किसी का, कोख किसी की जागी थी,
जिसने रोंदी शुचिता, उसकी ममता क्यों न त्यागी थी?
मूल दोष उस परवरिश का, जहाँ दंभ को बोते हैं,
बेटों को स्वामी कह-कह कर, संस्कारों को खोते हैं।

क्षणिक जागृति, छद्म क्रोध, यह मोमबत्ती का दिखावा है,
बुझती आग और फिर वही, कुत्सित तिमिर का बुलावा है।
पूछ रहा है काल आज—निर्भया कब निर्भय होगी?
क्या वह फिर से इस मिट्टी में, केवल एक विरह-जोगी?

वह निर्भय तब होगी, जब घर से डगर सुरक्षित हो,
जब हर नर की दृष्टि यहाँ, पावन और सुदीक्षित हो।
केवल फंदा दंड नहीं, उस सोच को हमें जलाना है,
जो नारी को भोग समझती, उस दानव को मिटाना है।

शुचिता कब शुचि होगी अब? मर्यादा कब निष्कलंक हो?
कब इस कलयुगी रावण का, मस्तक धड़ से अंत हो?
वह शुचि तब होगी, जब मन का मैल यहाँ धुल जाएगा,
जब न्याय का बंद कपाट, सिसकियों पर भी खुल जाएगा।

हृदय-पटल पर अंकित देखो, उस अबला का रक्त-चिह्न,
मानवता के मानचित्र को, कर डाला जिसने छिन्न-भिन्न।
यदि अब भी शोणित न खौला, तो यह नस-नस मृत-पाषाण है,
आने वाले महाप्रलय का, यह प्रथम उद्घोष बाण है।

उठो कि अब प्रतिकार चाहिए, क्षमा-दान का अंत करो,
इन नर-पशुओं के अस्तित्व का, जड़ से ही अब अंत करो।
पर मारो उस कुत्सित सोच को, जो वासना में अंधी है,
जो मातृ-शक्ति की गरिमा को, छलने में ही सन्नद्ध-मंदी है।

न्याय की देवी सोती है, या वह भी आज लाचार हुई?
मर्यादा की पावन सरिता, नरक-द्वार की धार हुई।
अंतिम हुंकार करो ऐसी, कि सिंहासन हिल जाए,
न्याय की उस अंधी पट्टी में, फिर से दृष्टि मिल जाए।

सतीत्व-कथा की यह धरती, आज क्रूर अपमान सहती है,
भय के भीषण पावक में, अब हर बेटी यहाँ दहती है।
ये लहूलुहान मंजर-साक्ष्य, और न्याय का यह काला खंड,
लिख रहे हैं सिसकियों से, “विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड।”