विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड
कहाँ लुप्त वह तेजपुंज? वह आर्य-रक्त अब श्वेत हुआ?
क्या पौरुष का वह प्रचंड रवि, तिमिर-गर्त में सुप्त हुआ?
मृदुल कली का अंग-अंग जब, दानव-नख से विदीर्ण था,
तब न्याय-खड्ग क्या शासक के, स्वर्ण-कोष में जीर्ण था?
विधि-विधान की आँखों पर तो, पट्टी जानबूझकर बंधी है,
पर न्याय माँगती यह जनता, स्वयं क्यों होकर अंधी है?
वह पत्थर की प्रतिमा तो केवल, प्रतीक भर एक अंधी है,
पर यहाँ खड़ी जो भीड़ देख रही, क्या वह भी सन्न-मंदी है?
वह भी तो था पुत्र किसी का, कोख किसी की जागी थी,
जिसने रोंदी शुचिता, उसकी ममता क्यों न त्यागी थी?
मूल दोष उस परवरिश का, जहाँ दंभ को बोते हैं,
बेटों को स्वामी कह-कह कर, संस्कारों को खोते हैं।
क्षणिक जागृति, छद्म क्रोध, यह मोमबत्ती का दिखावा है,
बुझती आग और फिर वही, कुत्सित तिमिर का बुलावा है।
पूछ रहा है काल आज—निर्भया कब निर्भय होगी?
क्या वह फिर से इस मिट्टी में, केवल एक विरह-जोगी?
वह निर्भय तब होगी, जब घर से डगर सुरक्षित हो,
जब हर नर की दृष्टि यहाँ, पावन और सुदीक्षित हो।
केवल फंदा दंड नहीं, उस सोच को हमें जलाना है,
जो नारी को भोग समझती, उस दानव को मिटाना है।
शुचिता कब शुचि होगी अब? मर्यादा कब निष्कलंक हो?
कब इस कलयुगी रावण का, मस्तक धड़ से अंत हो?
वह शुचि तब होगी, जब मन का मैल यहाँ धुल जाएगा,
जब न्याय का बंद कपाट, सिसकियों पर भी खुल जाएगा।
हृदय-पटल पर अंकित देखो, उस अबला का रक्त-चिह्न,
मानवता के मानचित्र को, कर डाला जिसने छिन्न-भिन्न।
यदि अब भी शोणित न खौला, तो यह नस-नस मृत-पाषाण है,
आने वाले महाप्रलय का, यह प्रथम उद्घोष बाण है।
उठो कि अब प्रतिकार चाहिए, क्षमा-दान का अंत करो,
इन नर-पशुओं के अस्तित्व का, जड़ से ही अब अंत करो।
पर मारो उस कुत्सित सोच को, जो वासना में अंधी है,
जो मातृ-शक्ति की गरिमा को, छलने में ही सन्नद्ध-मंदी है।
न्याय की देवी सोती है, या वह भी आज लाचार हुई?
मर्यादा की पावन सरिता, नरक-द्वार की धार हुई।
अंतिम हुंकार करो ऐसी, कि सिंहासन हिल जाए,
न्याय की उस अंधी पट्टी में, फिर से दृष्टि मिल जाए।
सतीत्व-कथा की यह धरती, आज क्रूर अपमान सहती है,
भय के भीषण पावक में, अब हर बेटी यहाँ दहती है।
ये लहूलुहान मंजर-साक्ष्य, और न्याय का यह काला खंड,
लिख रहे हैं सिसकियों से, “विदीर्ण चेतना का रक्तरंजित ब्रह्मांड।”

“मेरा नाम कन्हैया कुमार है। मैं मूलतः मधुबनी (बिहार) की सांस्कृतिक चेतना से संबद्ध हूँ और वर्तमान में अहमदाबाद में एक वरिष्ठ प्रबंधक (Senior Manager) के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहा हूँ। यांत्रिक अभियांत्रिकी (Mechanical Engineering) और प्रबंधन (MBA Finance) की व्यावसायिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, हिंदी साहित्य मेरा आत्मिक क्षेत्र है।
मेरी काव्य-शैली तत्सम प्रधान शब्दावली और गहन भाव-बोध पर आधारित है। मेरी लेखनी मानवीय संवेदनाओं के विविध आयामों—चाहे वह ओज हो, करुण हो या सौंदर्य—को शब्दबद्ध करने का प्रयास करती है।
साहित्य के प्रति इसी समर्पण हेतु मुझे ‘शब्द प्रतिभा बहुक्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन, नेपाल’ द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा रत्न मानद उपाधि-2026’ से विभूषित किया गया है। इसके अतिरिक्त, IIIT नागपुर की अखिल भारतीय प्रतियोगिता ‘रसधारा-2026’ में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। अब तक ५०० से अधिक मौलिक रचनाओं के माध्यम से मेरा ध्येय हिंदी काव्य की गरिमा को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करना है।”


