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जिम्मेदारी जो बचपन में आ गई, a poetry by Muskan, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

जिम्मेदारी जो बचपन में आ गई

जिम्मेदारी जो बचपन में आ गई सोचो हालातों ने उसके साथ क्या क्या करा हुआ होगाजो एक बच्चा अपने ही घर जाने से डरा हुआ होगा | स्कूल में छुट्टी की घंटी, बच्चों की खिलखिलाहट थी,लेकिन कोने में बैठे उस बच्चे के मन में डर की आहट थी| जिसने बचपन में माँ की चीखें पिता

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आत्मविश्वास और साहस, a story by Aakanksha Thakur, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

आत्मविश्वास और साहस

आत्मविश्वास और साहस दिनांक 7 अगस्त 2022, रविवार । सुबह के ठीक छह बजे थे, जब मैं अपने जीवन के पहले ट्रेक के लिए घर से निकली। दिल में उत्साह की हलचल थी, आँखों में पहाड़ की ऊँची चोटी को छू लेने का सपना और मन में कुछ नया कर गुजरने का अटूट जुनून। सबसे

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गुब्बारे वाला बच्चा, a poetry by Bhagat Singh, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

गुब्बारे वाला बच्चा

गुब्बारे वाला बच्चा घूम रहा थाबीच सड़क केपैदल पथ परदस-दस, के गुब्बारे बांधेहोंगे दस या बीसबांस की लकड़ी पर लटके गुब्बारेरंग बिरंगे तैर हवा मेंछेड़ रहे थे अजब स्पंदनएक दूजे को छेड़-छेड़ करमानो दो जोड़ो के कंधेआपस में मिलकर टकरातेफिर थोड़ा हटकर मुस्कातेदी थी उसने साँसेउन निर्जीव से दिखतेरबर के थैलों,को अपनेहिस्से की मिली साँसे

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मैं, a poetry by Rita Chauhan, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

मैं

मैं ‘मैं’, एक विचित्र शब्द है ये,ऊँचे पर्वत चढ़ाए कभी,तो कभी झट से नीचे गिरा दिया।ब्रह्मांड के रहस्य ढूँढ निकालेतो कभी स्वयं के भीतर से भी अनभिज्ञ रखा।हज़ारों मित्र बनवाये कभी,कभी एक रिश्ता सम्भाल पाया नही।‘मैं’ ही था परेशानियों की तेज़ आँधियों के बीच,विश्वास के दिये कि लौ को जलाए।ये ‘मै’ ही था सूरज के

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अहसासों की बात, a poetry by Parveen Gill, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

अहसासों की बात

अहसासों की बात यूँ तो कितने ही कागज भर दूँलिखते-लिखते दिल के जज़्बात,खत्म होती नहीं फिर भीजीवन में आते-जातेग़म और खुशी के अहसासों की बात।कभी खुशी की फुहारेंभिगो देती हैं,मन की तृष्णा की तड़प को।कभी ग़म की कसकतीर सी चुभती है दिल में,और बहा देती है निरंतरअश्कों के समन्दर को।इच्छाओं की वासना की अग्निकाश कभी

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चिड़िया, a poetry by Sweta Kumari, Participant, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

चिड़िया

चिड़िया राहगीर अपने सफर मेंएक निर से रूबरू होता।नज़र फेरते ही खुश हो गया,झूम उठा वो एक चिड़िया के होने से,मानो उसे गंज-ए-ताला हासिल हो गया।नख़ल की तरह वो बड़ी होती रही,अब वह चिड़िया काबिल-ए-एहसास हो गई।उसकी जिंदगी में एक अली दाखिल हुई,जिसके लिए वह चिड़िया सांसों की तरह थी,उसे हमेशा पास रखती।अली जब भी

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वक्त, a poetry by Prachi Nagargade, Celebrate Life with Us at Gyaannirudra

वक्त

वक्त कहते है वक्त को भी वक्त लगता हैकुछ गम भुलाने के लिएहम कितना ये वक्त के पीछे भागते है नाये समय ना हुआ जैसे किसी गाड़ी का पहिया हुआजो एक दिशा से दूसरी दिशादूसरी से तीसरी और बस चलते रहता हैकहते है हर ज़ख्मो पे मरहम है येहर दुआ की उम्मीद है येहर नाराज़गी

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कायर कौन?

कायर कौन? तुमने कहा था नहीं मानतेतुम जाति-धर्म की लकीरे,तुमने कहा था कि तुम्हारेलिए केवल प्रेम धर्म हैं……क्या झूठ थी तुम्हारी कही हर बात,क्या झूठ था हमारा प्यार,क्या झूठ था अब तक का साथ,क्या सच में सब झूठ ही था…….जा रही हूँ इस संसार से,जहाँ लोगों को जाति-धर्म,के आधार पर बाटां न जाए,जा रही हूँ

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